*विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस के उपलक्ष्य में विशेष
*लेख मन का भी रखिए ख़याल

*मानसिक स्वास्थ्य केवल बीमारी का उपचार नहीं: स्वाति गुप्ता
*Man Sukoon Mental Health Care
*संस्थापक एवं परामर्श मनोवैज्ञानिक*— *स्वाति गुप्ता* के विचार
लगभग 8 वर्षों के परामर्श अनुभव के आधार पर बच्चों, किशोरों, अभिभावकों एवं वयस्कों के साथ कार्य करते हुए *मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक संतुलन,* पारिवारिक संबंधों, अभिभावकत्व, जीवनशैली तथा वर्तमान पीढ़ी की मनोवैज्ञानिक चुनौतियों पर विशेष विचार।
आज की तेज़ रफ्तार जिंदगी में हमारे पास लगभग हर चीज़ के लिए समय है—काम के लिए, पढ़ाई के लिए, मोबाइल के लिए, सामाजिक माध्यमों के लिए, दूसरों की अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए; लेकिन अक्सर अपने मन के लिए समय नहीं है।
हम अपने घर की सफाई करते हैं, घर का नवीनीकरण करते हैं, अपनी बाहरी दुनिया को व्यवस्थित करते हैं, लेकिन जिस मन के साथ हमें पूरी जिंदगी जीना है, उसके भीतर जमा तनाव, असंतोष, डर, अकेलापन और थकान को व्यवस्थित करने के बारे में कितना सोचते हैं?
यहीं से मानसिक स्वास्थ्य की वास्तविक समझ शुरू होती है।
मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ यह नहीं है कि व्यक्ति के जीवन में कोई समस्या ही न हो। मानसिक रूप से स्वस्थ व्यक्ति वह नहीं है, जिसे कभी दुख, चिंता, असफलता या तनाव महसूस न हो; बल्कि वह है, जो इन अनुभवों के बीच स्वयं को संभालना, आवश्यकता पड़ने पर सहायता लेना, परिस्थितियों से सीखना और जीवन में फिर से संतुलन बनाना सीखता है।
लगभग आठ वर्षों से बच्चों, किशोरों, अभिभावकों और विभिन्न आयु वर्ग के लोगों के साथ परामर्श कार्य करते हुए मैंने एक बात बहुत गहराई से महसूस की है—आज मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी अनेक समस्याओं की शुरुआत किसी एक बड़ी घटना से नहीं, बल्कि लंबे समय तक बिगड़ी हुई जीवनशैली, संवाद की कमी, अत्यधिक अपेक्षाओं, भावनात्मक दबाव और स्वयं से दूर होते जाने की प्रक्रिया से होती है।
हर दर्द बीमारी नहीं, लेकिन हर दर्द को समझना ज़रूरी है
जीवन में कठिन समय आना स्वाभाविक है। असफलता, परीक्षा का दबाव, भविष्य और रोजगार की चिंता, संबंधों में समस्या, परिवार में तनाव, आर्थिक परेशानी, अकेलापन और किसी प्रिय व्यक्ति को खो देना—ये सभी जीवन के कठिन अनुभव हो सकते हैं।
समस्या तब बढ़ती है, जब व्यक्ति अपने दर्द को स्वीकार करने के बजाय उससे लगातार भागता रहता है।
कई बार हम कहते हैं—“मैं ठीक हूँ”, जबकि भीतर से व्यक्ति बिल्कुल ठीक नहीं होता। वह चिड़चिड़ा हो सकता है, लोगों से दूर रहने लग सकता है, उसकी नींद और खान-पान में बदलाव आ सकता है, किसी काम में मन नहीं लग सकता या वह लगातार स्वयं की तुलना दूसरों से करने लग सकता है।
हमें यह समझना होगा कि भावनात्मक परेशानी कमजोरी नहीं है। सहायता माँगना भी कमजोरी नहीं है।
यदि किसी व्यक्ति में लंबे समय तक उदासी, अत्यधिक चिंता, नींद में गंभीर बदलाव, सामाजिक दूरी, निराशा, अपने प्रति नकारात्मक भावना, नशे की ओर बढ़ने की प्रवृत्ति या स्वयं को नुकसान पहुँचाने जैसे विचार दिखाई दें, तो इसे केवल “मनोदशा खराब है” कहकर टालना उचित नहीं है। ऐसे समय में परिवार, शिक्षक, परामर्शदाता, मनोवैज्ञानिक या आवश्यकता के अनुसार अन्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से सहायता लेना महत्वपूर्ण है।
आज की पीढ़ी और अपेक्षाओं का बढ़ता दबाव
आज की पीढ़ी के सामने अवसर बहुत हैं, लेकिन उसी अनुपात में तुलना और अपेक्षाएँ भी बढ़ी हैं।
अच्छे अंक चाहिए।
अच्छा भविष्य चाहिए।
दूसरों से आगे निकलना है।
हर समय स्वयं को सफल साबित करना है।
सामाजिक माध्यमों पर भी जीवन अच्छा दिखाई देना चाहिए।
और कई बार व्यक्ति को यह भी लगता है कि उसे हर परिस्थिति में मजबूत ही दिखाई देना है।
लेकिन मनुष्य कोई मशीन नहीं है।
हमारी वास्तविक क्षमता और हमारी अपेक्षाओं के बीच का अंतर जितना बढ़ता जाता है, मानसिक दबाव उतना ही बढ़ सकता है।
जीवन में लक्ष्य रखना आवश्यक है, लेकिन लक्ष्य प्राप्त करने की दौड़ में स्वयं को खो देना सफलता नहीं है।
बच्चों और युवाओं को यह समझाना आवश्यक है कि एक परीक्षा का परिणाम उनके पूरे व्यक्तित्व का परिणाम नहीं होता। एक असफलता उनकी पूरी जिंदगी की असफलता नहीं होती और किसी दूसरे व्यक्ति की उपलब्धि उनकी अपनी कीमत कम नहीं करती।
आज हमें बच्चों को केवल प्रतियोगिता के लिए तैयार करने की नहीं, बल्कि जीवन की परिस्थितियों से स्वस्थ तरीके से निपटना सिखाने की भी आवश्यकता है।
*दैनिक दिनचर्या* : मानसिक स्वास्थ्य की पहली नींव
मेरे परामर्श अनुभव में बार-बार यह देखने को मिला है कि कई भावनात्मक परेशानियों को संभालने की शुरुआत किसी बहुत बड़ी तकनीक से नहीं, बल्कि जीवन की छोटी-छोटी आदतों को व्यवस्थित करने से होती है।
*एक संतुलित दिनचर्या मानसिक स्वास्थ्य की महत्वपूर्ण नींव बन सकती है*
समय पर सोना और जागना, पर्याप्त नींद लेना, नियमित शारीरिक गतिविधि करना, संतुलित भोजन लेना, पर्याप्त पानी पीना, कुछ समय प्रकृति और धूप के संपर्क में रहना, मोबाइल तथा अन्य उपकरणों से नियमित दूरी बनाना और अपने लिए कुछ शांत समय निकालना—ये साधारण लगने वाली बातें मन और शरीर दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
जिस तरह हम अपने घर को समय-समय पर व्यवस्थित और नया रूप देते हैं, उसी तरह अपने जीवन और दिनचर्या का भी समय-समय पर मानसिक नवीनीकरण करना चाहिए।
कभी अपनी आदतों को देखिए।
कभी अपनी प्राथमिकताओं को देखिए।
और कभी स्वयं से पूछिए—
“क्या मैं सच में खुश हूँ या केवल व्यस्त हूँ?”
यह एक छोटा-सा प्रश्न व्यक्ति को अपने जीवन की दिशा पर दोबारा विचार करने के लिए प्रेरित कर सकता है।
ध्यान : मन को रोकना नहीं, समझना है
ध्यान को केवल धार्मिक या आध्यात्मिक अभ्यास के रूप में देखने के बजाय इसे अपने मन को समझने का एक माध्यम भी माना जा सकता है।
प्रतिदिन कुछ मिनट शांत बैठना, अपनी श्वास पर ध्यान देना, वर्तमान क्षण को महसूस करना और लगातार आने वाले विचारों को बिना तुरंत प्रतिक्रिया दिए देखना व्यक्ति को अपनी भावनाओं को समझने में सहायता कर सकता है।
लेकिन यह भी समझना आवश्यक है कि ध्यान किसी गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्या का अकेला उपचार नहीं है। जहाँ विशेषज्ञ सहायता की आवश्यकता हो, वहाँ योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लेना जरूरी है।
*मन को शांत करने से पहले मन को समझना आवश्यक है।*
खान-पान और मानसिक स्वास्थ्य
हम अक्सर मानसिक स्वास्थ्य की चर्चा में भोजन को भूल जाते हैं।
शरीर और मन दो अलग-अलग दुनिया नहीं हैं। अनियमित खान-पान, अत्यधिक कृत्रिम एवं प्रसंस्कृत भोजन, बहुत अधिक चाय-कॉफी, पानी की कमी और खराब नींद की आदतें हमारे समग्र स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं।
इसलिए भोजन में संतुलन, पर्याप्त पानी, फल-सब्जियाँ, आवश्यक पोषक तत्व और नियमित भोजन के समय जैसी बुनियादी आदतों को महत्व देना चाहिए।
स्वस्थ मन के लिए स्वस्थ जीवनशैली कोई विलासिता नहीं, बल्कि आवश्यकता है।
अभिभावकत्व : बच्चे को केवल पढ़ाना नहीं, समझना भी है
आज अभिभावकत्व के सामने एक बड़ी चुनौती यह है कि माता-पिता अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं और बच्चे अपनी स्वतंत्रता तथा पहचान को लेकर।
कहीं माता-पिता बहुत अधिक कठोर हैं, कहीं इतने अधिक सुरक्षा देने वाले हैं कि बच्चे को निर्णय लेने का अवसर ही नहीं मिलता और कहीं दोनों माता-पिता के कामकाजी होने के कारण समय की कमी भावनात्मक दूरी में बदलने लगती है।
लेकिन अभिभावकत्व का प्रश्न केवल यह नहीं है कि—
“बच्चा हमारी बात मानता है या नहीं?”
सवाल यह भी होना चाहिए—
“क्या बच्चा अपनी बात हमसे कह पाता है?”
एक बच्चे को अनुशासन भी चाहिए और भावनात्मक सुरक्षा भी।
उसे सीमाएँ भी चाहिए और उचित स्वतंत्रता भी।
उसे मार्गदर्शन भी चाहिए और अपनी बात रखने की स्वतंत्रता भी।
हर गलती पर डाँटना समाधान नहीं है और हर गलती को नजरअंदाज करना भी अच्छा अभिभावकत्व नहीं है।
बच्चे के व्यवहार के पीछे छिपी आवश्यकता को समझना अभिभावकत्व की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों में से एक है।
कई बार बच्चा “बदतमीज़” नहीं होता, वह निराश होता है।
कई बार वह “आलसी” नहीं होता, वह भावनात्मक रूप से थका हुआ होता है।
कई बार वह “ध्यान नहीं देता”, क्योंकि उसके मन में कुछ और चल रहा होता है।
इसलिए बच्चों के साथ केवल बातचीत नहीं, बल्कि भावनात्मक जुड़ाव भी आवश्यक है।
कामकाजी माता-पिता : समय कम हो सकता है, जुड़ाव नहीं
आज बहुत से परिवारों में माता और पिता दोनों काम करते हैं। यह अपने आप में कोई समस्या नहीं है। समस्या तब बनती है, जब काम का तनाव, घर की जिम्मेदारियाँ और बच्चों की जरूरतें बिना संवाद के एक-दूसरे से टकराने लगती हैं।
बच्चे को हर समय माता-पिता की शारीरिक उपस्थिति की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन उसे यह विश्वास चाहिए कि—
*“जब मुझे वास्तव में जरूरत होगी, मेरे माता-पिता मेरे साथ होंगे।”*
हर दिन कुछ समय बिना मोबाइल, बिना उपदेश और बिना निर्णय सुनाए बच्चे को सुनना एक बहुत बड़ा भावनात्मक निवेश हो सकता है।
बच्चे को महँगे उपहारों से अधिक कई बार समय, ध्यान, विश्वास और बिना शर्त स्वीकार किए जाने की आवश्यकता होती है।
पति-पत्नी के रिश्ते और मानसिक स्वास्थ्य
मानसिक स्वास्थ्य केवल व्यक्ति की व्यक्तिगत समस्या नहीं है। परिवार का भावनात्मक वातावरण भी व्यक्ति को प्रभावित करता है।
पति-पत्नी के बीच संवाद की कमी, लगातार विवाद, आर्थिक तनाव, अधूरी अपेक्षाएँ, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और समय की कमी या लंबे समय तक चलने वाला तनाव घर के वातावरण को प्रभावित कर सकता है।
ऐसे समय में केवल यह पूछना कि “कौन सही है?” पर्याप्त नहीं है।
यह पूछना भी आवश्यक है—
“हमारी समस्या क्या है और हम दोनों इसे कैसे समझ सकते हैं?”
हर मतभेद संबंध की असफलता नहीं होता। लेकिन लगातार संवाद का टूटना रिश्ते और व्यक्ति के मानसिक स्वास्थ्य दोनों के लिए चुनौती बन सकता है।
आवश्यकता पड़ने पर दंपती परामर्श या मनोवैज्ञानिक सहायता लेना रिश्ते की कमजोरी नहीं, बल्कि उसे समझदारी से संभालने का प्रयास है।
आत्महत्या की रोकथाम : किसी की चुप्पी को भी सुनिए
आज आत्महत्या और स्वयं को नुकसान पहुँचाने जैसी घटनाओं को लेकर समाज में गंभीर चिंता है। इसलिए हमें केवल घटना के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय भावनात्मक संकट को पहले पहचानने की संस्कृति विकसित करनी होगी।
किसी व्यक्ति का यह कहना कि—
“मैं बहुत परेशान हूँ।”
“अब मुझसे नहीं हो रहा।”
“जीने का मन नहीं करता।”
-इसे हमेशा मज़ाक, कमजोरी या केवल ध्यान आकर्षित करने की कोशिश मानकर खारिज नहीं किया जाना चाहिए।
ऐसे संकेतों को गंभीरता से लेना, व्यक्ति को अकेला न छोड़ना और उसे तुरंत किसी भरोसेमंद व्यक्ति तथा मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से जोड़ना महत्वपूर्ण है।
किसी व्यक्ति की जिंदगी में सही समय पर की गई एक संवेदनशील बातचीत बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है।
हमें लोगों को यह संदेश देना होगा—
“समस्या बड़ी हो सकती है, लेकिन सहायता माँगना हमेशा संभव है।”
अपनी क्षमता को पहचानना सीखें
आज बहुत से लोग अपनी जिंदगी दूसरों के बनाए हुए मापदंडों पर जीने लगे हैं।
किसी की आय हमसे अधिक है।
किसी का बच्चा हमसे अधिक अंक लाता है।
किसी का करियर हमसे आगे है।
किसी का घर, जीवनशैली या सामाजिक जीवन अधिक आकर्षक दिखाई देता है।
लेकिन हम अक्सर यह भूल जाते हैं कि हम दूसरों के जीवन का केवल दिखाई देने वाला हिस्सा देखते हैं।
तुलना अक्सर उस वास्तविकता से होती है, जिसे हम पूरी तरह जानते ही नहीं।
इसलिए अपनी गति को स्वीकार करना आवश्यक है।
हर व्यक्ति की क्षमता अलग है।
हर व्यक्ति की परिस्थिति अलग है।
हर व्यक्ति की यात्रा अलग है।
दूसरों से आगे निकलने से अधिक महत्वपूर्ण है—कल के अपने स्वरूप से बेहतर बनना।
*मानसिक स्वास्थ्य का सबसे महत्वपूर्ण सूत्र* संतुलन
हम जीवन में संतुलन की बात बहुत करते हैं, लेकिन उसे जीना भूल जाते हैं।
काम भी चाहिए, आराम भी।
महत्वाकांक्षा भी चाहिए, स्वीकार्यता भी।
अनुशासन भी चाहिए, लचीलापन भी।
दूसरों की जिम्मेदारी भी है, लेकिन स्वयं की जिम्मेदारी भी है।
तकनीक भी चाहिए, लेकिन तकनीक से दूरी का समय भी चाहिए।
लोगों के साथ रहना भी जरूरी है और कभी-कभी स्वयं के साथ रहना भी।
जीवन हमेशा हमारे अनुसार नहीं चलेगा। लेकिन हर परिस्थिति के अनुसार स्वयं को बदलते रहना भी स्वस्थ जीवन नहीं है।
कभी परिस्थिति बदलनी होगी।
कभी अपनी सोच बदलनी होगी।
कभी अपनी अपेक्षा बदलनी होगी।
और कभी यह स्वीकार करना होगा कि कुछ चीजें हमारे नियंत्रण में नहीं हैं।
यही भावनात्मक परिपक्वता की शुरुआत है।
अंत में—अपने मन से एक रिश्ता बनाइए
मानसिक स्वास्थ्य का अर्थ हमेशा “खुश रहना” नहीं है।
कभी रो लेना भी मानसिक स्वास्थ्य है।
कभी “नहीं” कहना भी मानसिक स्वास्थ्य है।
कभी सहायता माँगना भी मानसिक स्वास्थ्य है।
कभी आराम करना भी मानसिक स्वास्थ्य है।
किसी हानिकारक परिस्थिति से दूरी बनाना भी मानसिक स्वास्थ्य का हिस्सा हो सकता है।
और अपनी गलतियों के बाद स्वयं को एक और अवसर देना भी।
हम अपने घर की दीवारों पर नया रंग कर सकते हैं, सामान बदल सकते हैं और घर का नवीनीकरण कर सकते हैं। लेकिन जीवन का वास्तविक नवीनीकरण तब होता है, जब हम अपने भीतर जमा पुराने डर, अपराधबोध, अवास्तविक अपेक्षाओं और नकारात्मक सोच को पहचानकर धीरे-धीरे उनके साथ काम करना शुरू करते हैं।
दर्द से भागकर जीवन सुंदर नहीं बनता; दर्द को समझकर, उससे सीखकर और आवश्यक सहायता लेकर आगे बढ़ना हमें मजबूत बनाता है।
इसलिए इस मानसिक स्वास्थ्य सप्ताह केवल यह संकल्प न लें कि हम तनावमुक्त रहेंगे। बल्कि यह संकल्प लें कि—
हम अपने मन को सुनेंगे।
अपने बच्चों को समझेंगे।
अपने रिश्तों में संवाद रखेंगे।
अपनी दिनचर्या को संतुलित करेंगे।
आवश्यकता पड़ने पर सहायता माँगेंगे।
और सबसे महत्वपूर्ण—कठिन समय को अपनी पूरी जिंदगी की पहचान नहीं बनने देंगे।
क्योंकि जीवन में समस्याएँ आना हमारे नियंत्रण में नहीं है, लेकिन उनके बीच स्वयं को संभालने की दिशा में कदम उठाना हमारे हाथ में है।
मानसिक स्वास्थ्य की शुरुआत किसी बड़े बदलाव से नहीं, बल्कि स्वयं को समझने के एक छोटे-से प्रयास से होती है।
*लेखिका परिचय*|
Man Sukoon Mental Health Care
लगभग 8 वर्षों के परामर्श एवं मनोवैज्ञानिक कार्य अनुभव के साथ स्वाति गुप्ता ने बच्चों, किशोरों, अभिभावकों, महिलाओं तथा विभिन्न आयु वर्ग के लोगों के भावनात्मक एवं मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य से जुड़े विषयों पर कार्य किया है।
अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने महिला आयोग से जुड़े कार्यों में भी अपना योगदान दिया है तथा महिला सशक्तिकरण, भावनात्मक जागरूकता, मानसिक स्वास्थ्य, व्यक्तित्व विकास और सामाजिक जागरूकता से संबंधित विभिन्न कार्यक्रमों एवं कार्यशालाओं में सक्रिय भूमिका निभाई है।
विद्यालयों में बच्चों एवं किशोरों की मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं को समझने, उनके व्यवहार, भावनात्मक समस्याओं, शैक्षणिक दबाव, पारिवारिक परिस्थितियों और सामाजिक चुनौतियों पर कार्य करने के साथ-साथ उन्होंने अभिभावकों के परामर्श एवं मार्गदर्शन पर भी विशेष रूप से कार्य किया है।
उनका अनुभव केवल विद्यालयी परामर्श तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जहाँ भी भावनात्मक सहयोग, मनोवैज्ञानिक समझ और मानवीय संवेदनशीलता की आवश्यकता रही, वहाँ उन्होंने अपने मनोवैज्ञानिक अनुभव और विशेषज्ञता के माध्यम से योगदान देने का प्रयास किया है।
विभिन्न स्तरों पर आयोजित अनेक प्रशिक्षण कार्यक्रमों, जागरूकता कार्यशालाओं एवं मानसिक स्वास्थ्य संबंधी गतिविधियों के माध्यम से उन्होंने मनोवैज्ञानिक जागरूकता को समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुँचाने में योगदान दिया है।
वर्तमान में वे जवाहर नवोदय विद्यालय, हुगली, पश्चिम बंगाल में परामर्श मनोवैज्ञानिक के रूप में कार्यरत हैं तथा मूल रूप से उत्तर प्रदेश से संबंध रखती हैं।
उनका मानना है कि-
“मनोवैज्ञानिक सहायता केवल समस्या के समय की आवश्यकता नहीं है; स्वयं को समझना, अपनी भावनाओं को स्वीकार करना और संतुलित जीवन जीना सीखना भी मानसिक स्वास्थ्य का महत्वपूर्ण हिस्सा है।”
* *स्वाति गुप्ता*
*संस्थापक एवं परामर्श मनोवैज्ञानिक*
*Man Sukoon Mental Health Care*











