जब गाँव की गलियाँ लिखनी हो,
या ताल-तलैया लिखनी हो,
जब घाम जेठ का लिखना हो,
या पीपल छइयाँ लिखनी हो,
कुछ और नही लिखता हूँ मैं,
बस प्रेम चंद लिख देता हूँ।
बस प्रेमचंद लिख देता हूँ।।
होरी की मेहनत लिखनी हो,
ममतामय धनिया लिखनी हो,
लिखना हो गोबर का यौवन,
या दानी गइया लिखनी हो,
जब आँसू बन ढलके पीड़ा,
तब करुण छंद लिख देता हूँ।
बस, प्रेमचंद लिख देता हूँ।
जुम्मन का हज़ जब लिखना हो,
या प्रेम का मजहब लिखना हो,
लिखनी हो खाला की पीड़ा,
या हक का मतलब लिखना हो,
तब मैं पंचों के निर्णय को,
सबकी पसंद लिख देता हूँ।
बस, प्रेमचंद लिख देता हूँ।
जब बनती सड़कें लिखनी हों,
औ महा-दुपहरी लिखनी हों,
जब हर कुदाल की मेहनत को,
एक भरी टोकरी लिखनी हो,
तब दिनभर-थके मजूरों को,
कुछ पवन मंद लिख देता हूँ।
बस प्रेमचंद लिख देता हूँ।
लिखनी हो बड़े घर की बेटी,
या कोई सुभागी लिखनी हो।
या चार बेटों की विधवा को,
जागतिक-अभागी लिखनी हो।
तब टूट रहे परिवारों पर,
मैं राग -अमंद लिख देता हूँ।
बस, प्रेमचन्द लिख देता हूँ।
जोखू की खाँसी लिखनी हो,
शोषित की फाँसी लिखनी हो,
जब सरपंचो, नेताओं की,
अति नीच उदासी लिखनी हो,
तब जनता का इस सत्ता से,
मैं महाद्वन्द लिख देता हूँ।
बस प्रेमचंद लिख देता हूँ ।
संदीप पांडेय












