मल्हनी के उपचुनाव में श्रीकला धनन्जय के सादगी भरे अंदाज को देखकर जनता हैरत में भी है और आनंदित भी।
शादी के बाद पहली बार जनता के बीच आई श्री कला प्रचार के अपने रोज रोज नए अंदाज से साथ वालों को, गांव वालों और सुनने देखने वालों को चकित कर दे रही हैं।
सामान्य तौर पर लोग प्रचार में हाथ जोड़कर या पैर छू कर वोट मांगते हैं, उसके विपरीत श्री कला के प्रचार की कला सबसे अलग है।
पहले ही दिन से ही वो लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाने लगी थी, बुजुर्ग महिलाओं, छोटे बच्चों, नवयुवकों, और बड़ो को जिस अंदाज और सम्मान से अपना बनाया वो काबिलेतारीफ है।

धनन्जय सिंह यही के परिवेश में पले बढ़े हैं, सबसे घर का नाता है, उनका अपनापन समझ में आता है, जबकि श्री कला धनन्जय सिंह विपरीत माहौल की रही है, बड़े घर की बेटी, बड़ा कारोबारी घराना, अमेरिका तक कि पढ़ाई, खुद बड़ी कारोबारी, गांव के रहन सहन से दूर फाइफ स्टार संस्कृति में रहने वाली श्री कला ने अपनी वो कला दिखाई की लोग चकित हैं।

उनका ब्यवहार कई मानो में धनन्जय सिंह से बढ़कर हैं। सांसद होने के बाद माना जाता है कि धनन्जय सिंह का कद इतना बड़ा हो गया है कि लोगों को उतने ऊंचे उठना पड़ता है,
जमीन तक उनको लाना लोग नही चाहते, उसके विपरीत श्री कला तो गांव की संस्कृति में रच बस गई हैं, ऐसे ऐसे काम मे हाथ लगा दे रही हैं, जो गांव की लड़कियां और औरते भी छोड़ चुकी हैं या नही करना चाहती।
श्री कला धनन्जय सिंह प्रचार के साथ साथ गांव के रंग का भी पूरा आनंद उठा रही है, सब समझ रही है और सबको अपना बना के सबके दिल में भी उतर रही हैं।
कनक पुर गांव में पहुँची तो पता चला कि कोई अपनी गाय का दूध निकालने जा रहा है, बाल्टी लेकर दूध निकालने लगी, अंदाज भी ऐसा जैसे कि जन्म से ग्वालिन रही हो।
दूसरे गांव पहुँची तो कुम्हार मिट्टी के बर्तन बना रहा था, उसकी चाक पे बैठ के दिया बनाने लगी, मिट्टी से सना हाथ, चेहरे में प्यारी मुस्कान, लोकप्रिय सांसद की पत्नी, उच्च कुल, उच्च शिक्षा से युक्त बहू के इस अंदाज को देखकर मिट्टी के बर्तन बनाने वाला ही नहीं पूरा गांव भाव विभोर हो गया, कुम्हार को तो आवाज ही नही निकल रही थी, बस प्रेम के आंसू आंखों में भर कर हंस रहा था।
इस समय गांव में धान की कटाई चल रही है, एक जगह धान पीटा जा रहा था,( धान के फसल को तखत पे पटका जाता है जिससे दाने अलग हो जाये)
श्री कला धनन्जय सिंह धान पीटने लगी, बात यँहा पीटने की नही थी, बात गांव के रहन सहन के समझने की है, जब आप किसी के दुख सुख, उसके कार्य, उसके रहन सहन को समझना चाहते हैं तो आपको उसके क्रिया कलाप को अपनाना पड़ेगा तभी उससे स्वाभाविक रूप से जुड़ पाएंगे, जिसको श्री कला भली भांति जानती हैं।
एक जगह मिट्टी के चूल्हे पे रोटी बन रही थी, लपक के रसोई में चली गई और पराठे बना डाले, देख कर लगा कि चूल्हे पे भी प्रयास कर के बना लेंगी।
कुल मिला के श्री कला धनन्जय सिंह ने जनता के मनोविज्ञान को बखूबी समझ लिया है, और खुद भी गांव, गांव की संस्कृति, और गांव के लोगों से खुद को जोड़ लिया है, उनका प्यार स्वाभाविक है, प्रचार भले कर रही हो लेकिन दिखावा कही नही है।
साथ प्रचार करने वाले लड़के भी कहते हैं, भाभी, चाची इतना मीठा बोलती हैं कि पुछिये मत, सबके खाने, नास्ते के लिए पूछती रहती हैं, कोई नही दिखा तो उसको याद करती रहती हैं।
धनन्जय सिंह के बचपन के मित्र अजित सिंह मजाक में कहते हैं कि नेता से अच्छी तो उनकी पत्नी हैं, नेता के ब्यवहार से अच्छा ब्यवहार श्री कला के पास है, जबकि धनन्जय अपने ब्यवहार के कारण ही जनता में लोकप्रिय हैं।
कुछ भी हो श्री कला ने अपने ब्यवहार से लोगो का दिल जीत लिया है, बेटा तो लोकप्रिय था ही बहू ने जो कदम बढ़ाएं हैं वो उनको भी पीछे छोड़ देंगी ये निश्चित है।












