लावारिश कन्या
किसी के कर्म का वह बीज,
किसी के शर्म का वहम।
था क्या ?कसूर उस नन्ही परी का
जो सह रही है जुल्मो सितम।
पड़ी थी वह लावारिश,
था,न कोई उसका आशियाना।
टूट गयी थी उम्मीद इस जहाँ से,
जिसका कोई न था याराना।
थी पड़ी नज़र सरकारी रहनुमाओ की,
भेज दी गयी वह अनाथालय में।
न तन पर वशन न पेट मे भोजन,
न नसीब हुई तालीम विद्यालय में।
किसी तरह वह मुरझाई कली,
फूल बन गयी थी।
पर यौवन के बसंत आने के पहले,
वह टूट चुकी थी।
क्योकि?उसके रक्षक ही भक्षक हो गए,
जो अपनी अस्मिता और गौरव से लूट चुकी थी।
लेखक खाद्य एवं रसद विभाग में आपूर्ति निरीक्षक के पद पर कार्यरत है। राजेन्द्र यादव












