साहित्य वाचस्पति डा0 श्रीपाल सिंह “क्षेम”के 100वी जयंती पर विशेष
एक पल ही जियो फूल बनकर जियो,शूल बनकर ठहरना नही जिन्दगी।।
अर्चना की संजोये हुए अंजली,तुम किसी देवता से मिलो तो सही।।
जिन्दगी की यहां अनगिनत डालिया,तुम किसी पर सुमन बन खिलो तो सही।।
एक पल ही जियो,तुम सुरभि बन जियो, धूल बनकर उमडना नही जिन्दगी।।
तम भरी बीथियो के अंधूरे सपन,कुमकुमी बांसुरी पर बजाते चलो।।
राम रोये हुए फूल की आंख में,त्योति की नव किरन तुम सजाते चलो।।
एक पल ही जियो प्रात बनकर जियो, रात बनकर उतराना नही जिन्दगी।।
चेतना के किसी भी क्षितिज से उठो,याचना के नयन कोर परसा करो।।
जिस लहर पर उडो जिस डगर पर बहो,कामना की सुधा बूंद बरसा करो।।
एक पल ही जियो तुम जलद बन जियो,बज्र बनकर घहरना नही जिन्दगी।।
बेदना की लहर मे डुबोये न जो,धार मे डूबते को किनारा बने।।
शोक जब श्लोक की पूनमी छांव में,पंथ हारे हुए को सहारा बने।।
एक पल ही जियो गीत बनकर जियो,अश्रु बनकर बिखरना नही जिन्दगी।।
डा0 श्रीपाल सिंह “क्षेम”
साहित्य वाचस्पति
के 100वी जयंती पर विशेष












