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पढ़िए साहित्य वाचस्पति डॉ. श्रीपाल सिंह क्षेम के जीवन से जुड़ी खास बातें | जन्म दिवस 02 सितंबर पर विशेष

Sankalp Savera by Sankalp Savera
August 31, 2020
in Jaunpur
0
पढ़िए साहित्य वाचस्पति डॉ. श्रीपाल सिंह क्षेम के जीवन से जुड़ी खास बातें | जन्म दिवस 02 सितंबर पर विशेष

साहित्य वाचस्पति डॉ. श्रीपाल सिंह क्षेम फाइल फोटो

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राजेश मौर्या जौनपुर

जौनपुर। ओ रंग रली, कंज कली को। नन्दन की मन्दारकली, तुम गमको सारी आयु रूप की मंहकी हुई जवानी में। मैं गीत रचूं अगवानी में… जैसे गीतों के प्रणेता हिन्दी साहित्य के यशस्वी कवि साहित्य वाचस्पति डा. श्रीपाल सिंह क्षेम का जन्म 02 सितंबर 1922 को जनपद मुख्यालय से लगभग 10 किमी पश्चिम स्थित बशारतपुर गांव में हुआ। एक कृषक परिवार में जन्में डॉ. क्षेम ने प्रारम्भिक शिक्षा गांव में प्राप्त किया। 

राज कालेज से माध्यमिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। उन दिनों इलाहाबाद साहित्य का केंद्र था। छायावाद के प्रमुख स्तंभों में जयशंकर प्रसाद को छोड़कर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, महादेवी वर्मा अपना डेरा जमाये हुए थे। नयी कविता के सशक्त हस्ताक्षर लक्ष्मीकांत वर्मा, डॉ. जगदीश गुप्ता, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, डॉ. धर्मवीर भारती साहित्यिक संस्था परिमल से जुड़े थे। डॉ. क्षेम की परिमल के सदस्य रहे। वैसे डॉ. क्षेम मूलत: गीतकार थे। इनके गीतों में प्रेम और सौंदर्य की अनुपम छठा देखने को मिलती है। श्रृंगार रस से ओत-प्रोत इनकी कविताओं में संयोग श्रृंगार का अद्भुत रुप झलकता है। रात चांदनी गीत गायी रही, बांह पर चांद हंसता रहा रात भर तथा मैं तुम्हारी चांदनी पीता रहूंगा, चांद में आज… जैसे गीत संयोग श्रृंगार के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। 


महादेवी वर्मा ने तो उन्हें गीत के राजकुमार की संज्ञा प्रदान की थी। डॉ. क्षेम राजनीतिक दृष्टि से कांग्रेस से जुड़े थे लेकिन आपातकाल में जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन उन्हें उद्धेलित कर दिया। लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना के उद्देश्य से रचे गये उनके गीत बहुत चर्चित हुए। नीदिया घरों से देखों, धूपिया मुंडेरा है, जभी से जगे भाई, तभी से सबेरा है तथा देश के सितारों बलिहारी, बलिहारी है, जैसे जनगीतों ने डॉ. क्षेम को लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचाने का कार्य किया। महाकाव्य के रुप में कृश्ण द्वैपायन जैसे प्रबंध काव्य की रचना करके डॉ. क्षेम ने अपने बहुआयामी व्यक्तित्व का प्रदर्शन किया। इस महाकाव्य के माध्यम से डॉ. क्षेम ने वर्तमान राजनीति और समाज की अनेक अनसुलझी गुत्थियों को सुलझाने का प्रयास किया। कविता के साथ-साथ गद्य की रचना में भी डॉ. क्षेम को महारत प्राप्त था। छायावाद की काव्य साधना, छायावाद के गौरव चिन्ह जैसे कृतियां डॉ. क्षेम का कुशल समीक्षक के रुप में स्थापित करती है। 


हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा साहित्य वाचस्पति की उपाधि से विभूषित डॉ. क्षेम का कुशल समीक्षक के रुप में स्थापित करती है। हिन्दी साहित्य सम्मेलन द्वारा साहित्य वाचस्पति की उपाधि से विभूषित डॉ. क्षेम को उप्र हिन्दी साहित्य संस्थान से साहित्य भूषण एवं मधुलिम ये पुरस्कार प्राप्त हुआ।

नीलम तरी, संघर्ष तरी, राख और पाटल, रुप तुम्हारा प्रीति हमारी, अन्तज्र्वाला जैसी दर्जनों कृतियों के प्रणेता डॉ. क्षेम ने एक पल ही जियो, फूल बनकर जियो, जैसे गीतों से मानवीय मूल्यों की स्थापना करने का सार्थक प्रयास किया है। डॉ. क्षेम के व्यक्तित्व पर दृष्टिपात किया जाये तो पता चलता है कि वे अत्यंत सहज एवं सरल व्यक्ति थे। उनके घर पर अक्सर लोगों का आना जाना लगा रहता था। तरह-तरह की परेशानियां लेकर लोग डॉ. क्षेम के पास आते थे।

डॉ. क्षेम एक जनप्रतिनिधि की भांति शोषित, पीड़ित, लोगों के साथ संबंधित अधिकारियों से मिलते, अधिकारीगण की एक ख्यातिलब्ध साहित्यिक व्यक्तित्व से मिलकर स्वयं को धन्य समझता और साथ में गये व्यक्ति की समस्या का यथासंभव व निराकरण भी कर देता। डॉ. क्षेम के व्यक्तित्व व कृतित्व को शब्दों में बांधा जाना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा ही प्रयास कहा जाएगा।

यद्यपि डॉ. श्रीपाल सिंह क्षेम आज हमारे बीच नहीं है फिर भी अपनी लोकप्रिय पंक्तियों के माध्यम से साहित्य के रसिकों के ह्मदय में आज भी जीवंत है। ऐसे ही साहित्यिक मनीषियों के बारे में कहा गया है – जयन्ति ते सुकृतिनो रस सिद्धा: कवीश्वरा। नास्ति येषां यश: काये, जरामरण जम् भयम्। 

इस क्रम में आगामी दो सितम्बर 2020 को जौनपुर पत्रकार भवन में एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया है। उक्त जानकारी डा0 क्षेम के पुत्र व जौनपुर पत्रकार संघ के अध्यक्ष शशि मोहन सिह क्षेम ने दिया।

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