डेंगू और स्क्रब के बीच फंसी लाखों जिंदगी
-तेज़ बुखार, सिर व पैर दर्द के साथ खून मे प्लेटलेट्स के गिरते ही परिजन व्याकुल
– जाँच व्यवस्था व दवाओं का सरकारी अस्पतालों मे अभाव का फायदा नर्सिंग होम संचालक उठा रहे
स्वास्थ्य प्रशासन डेंगू मरीजों का आंकडा जोड़कर कागज का पेट भर रहा

कैलाश सिंह
जौनपुर l बीते 26 अक्टुबर को एक निजी अस्पताल की चिकित्सक डॉ अलका अग्रवाल ने प्रदेश की राजधानी स्थित निजी अस्पताल वेदान्ता में डेंगू के चलते दम तोड़ दिया, इससे जाहिर होता है कि जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था डेंगू के सामने पनाह मांग चुकी है l
बनारस के बीएचयू की एक रिपोर्ट की मानें तो डेंगू मच्छर के साथ एक स्क्रब नामक कीड़ा भी काट रहा जिसका लक्षण डेंगू से मिलता- जुलता है l लेकिन ये तय है की बलिया से लेकर नोयडा, गाजियाबाद तक डेंगू तीन महीने से जानलेवा बना हुआ है l जिले के स्वास्थ्य महकमे की मानें तो अब तक डेंगू के 385 मरीज चिन्हित हुए हैं l जबकि इससे चार गुना ज्यादा मरीज निजी अस्पतालों में भर्ती हो रहे केवल जौनपुर में l अब इनमें यह तय करना कठिन हो रहा है कि कौन डेंगू, स्क्रब या फिर वायरल अथवा मियादी बुखार से ग्रस्त है l
जांच के नाम पर निजी पायथालोजी में भी खूब खेल चल रहा l अधिकतर तो अपने ही यहाँ जांच करके डेंगू का इलाज कर रहे l एक हफ्ते में भर्ती मरीज को छोड़ा जाता है तो परिजनों को 50 से 60 हजार भुगतना पड़ रहा है l जांच रिपोर्ट क्या आएगी इसका सिग्नल पहले ही निजी चिकित्सक दिये रहते हैं l
प्लेटलेट्स 50 हजार से नीचे आते ही मरीज के परिजनों का दम फूलने लगता है l
पिछले तीन महीने से जिले समेत पूर्वांचल की हालत कोरोना काल जैसी हो चली है l हर घर में बुखार से पीड़ित एक- दो मरीज मिल रहे l जिंन मरीजों में कमजोरी है लेकिन बीमारी नहीं चिन्हित हो रही उनको चिकित्सक रहस्यमय बुखार बताकर इलाज कर रहे l प्लेटलेट्स चढ़ाने वालों की तो भरमार हो गई है l गाँव के झोलाछाप शहरों के निजी अस्पतालों के लिए रेफरल सेंटर के दलाल बन गए हैं,
बाकी सरकारी अस्पतालों के कुछ कर्मचारी भी मरीज भेजने का कमीशन लेते हैं l इस धन्धे में वार्ड ब्वाय से लेकर आशा कार्यकर्ता को भी मोहरा बना लिया जाता है , इसका प्रमाण किसी भी जिला अस्पताल में पांच घण्टे बिताने पर मिल जाएंगे l












