अदूरदर्शी साबित होगा भाजपा का निर्णय?
पारसनाथ यादव की अनुपस्थिति में लड़ाई धनन्जय सिह से
रिर्पोट- राजीव पाठक
जौनपुर।सपा के कद्दावर नेता पारसनाथ यादव के निधन से रिक्त हुई मल्हनी विधानसभा सीट पर उपचुनाव की घोषणा कभी भी हो सकती है।यह सीट कितनी प्रतिष्ठित व महत्वपूर्ण है इसका अंदाजा इसी से हो जाता है कि प्रदेश के मुखिया योगी आदित्यनाथ को स्वयं इस कोरोना काल मे भी इस सीट को कब्जाने के लिये मैदान में उतरना पड़ रहा है,और हो भी क्यों ना!आखिर इस सीट पर भाजपा अपने प्रचंड बहुमत के समय भी मुंह की खा चुकी है।वहीं लम्बे समय से ये सीट जनपद के दो राजनीतिक दिग्गजों स्व0पारसनाथ यादव व पूर्व सांसद धनजंय सिंह के बीच ही रही है।

वहीं कभी धनजंय सिंह की अगुवाई में जनपद में नीला परचम लहराने वाली बसपा फिलवक्त भाजपा से खफा चल रही ब्राह्मण बिरादरी के वोट बैंक को साधने के फेर किसी ब्राह्मण प्रत्याशी को इस चुनावी रण में उतार सकती है जबकि सपा से पारस के उत्तराधिकारी के रूप में लकी मैदान में ताल ठोक रहें हैं।दावे और वादे के दौर फिर शुरू हैं,कौन किस पर भारी होगा ये तो वक्त बताएगा।मल्हनी के इतिहास को देखें तो पूर्व में यह रारी विधानसभा हुआ करती थी।
2002 से रारी विधानसभा सीट पर कभी निर्दल तो कभी किसी दल के साथ धनजंय सिंह का जलवा रहता था।2009 में बसपा से सांसद बनने के बाद इसी रारी सीट पर धनंजय के पिता राजदेव सिंह की आसान जीत सबको याद है।किंतु बदले परिसीमन व विपरीत हालात में जेल में रहते धनंजय 2012 के चुनाव में नए परिसीमन में रारी से मल्हनी बनी विधानसभा में अपने परिवार की जीत कायम ना रख पाए,किन्तु उनके अकेले के वोट बैंक ने सभी दलों को दहला जरूर दिया था।
गौर करे तो रारी व मल्हनी विधानसभा की राजनीति पारस और धनंजय के ही इर्द गिर्द घूमती रही है जिसकी कांटे की जंग 2017 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिली थी, राजनैतिक जानकारों की मानें तो इस उपचुनाव में अब वो जंग नही दिखेगी।तीन लाख 62 हजार मतदाता संख्या वाले इस विधानसभा के जातिगत वोट पर गौर करें तो यहां यादव मतदाता 80हजार,ब्राह्मण लगभग 30हजार,क्षत्रिय 35हजार,अनुसूचित 60हजार व निषाद 30 हजार मतदाता हैं।वही शेष में पिछडा वर्ग की कुछ मुख्य जातियां जैसे मौर्य,पटेल,राजभर, चौहान है,जो कि चुनाव में नारायण भूमिका निभा सकते हैं।
पूर्व के जीत के आंकड़ो पर गौर करें तो 69 हजार वोट के साथ पारसनाथ चुनाव जीत गए थे जबकि दूसरे स्थान पर रहने वाले धनंजय को 48 हजार वोट मिले थे इस चुनाव में वे निषाद पार्टी के टिकट पर मैदान में थे।जबकि बसपा के विवेक यादव को 46 हजार तथा भाजपा के सतीश सिंह को भाजपा की लहर में भी महज 38 हजार वोट से संतोष करना पड़ा था।अब ना तो वो लहर है,ना वो पारस जो जिस सीट को छू ले वो जीत जाए।
राजनैतिक सूत्रों की मानें तो इस वक्त ब्राह्मण के भाजपा से नाराजगी का फायदा बसपा उठाना चाहती है जिसके लिए बसपा इस सीट पर ब्राह्मण प्रत्याशी जे पी दुबे को मैदान में उतार सकती है? वहीं पारसनाथ की अनुपस्थिति में सबसे मजबूत दावेदार धनंजय सिंह निषाद पार्टी के सिम्बल पर चुनाव लड़ सकते हैं।हालांकि निषाद पार्टी एक तरफ जहां प्रदेश में भाजपा की समर्थक पार्टी है वहीं इस सीट पर बीते दिनों भाजपा के खुद चुनाव लड़ने की बात इनके कई नेताओं कहकर जिले की राजनीती और भी गर्म कर दी।
चूंकि दशकों से इस सीट पर चौथे या पांचवे स्थान पर रहने वाली भाजपा को इस को अपने खाते में मिलाने के लिये निषाद पार्टी के खाते में सीट छोड़ने की चर्चा तेज थी।राजनैतिक गुरुओं की बात पर गौर करें तो अपने प्रचण्ड लहर में जिस सीट को भाजपा ना जीत पाई थी तो फिलवक्त परिस्थितियां तो काफी विपरीत हैं,ऐसे में भाजपा आलाकमान का यह निर्णय अदूरदर्शी साबित होगा?











