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Sankalp Savera
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जौनपुर है रंग-बिरंगी विरासत का शानदार नमूना

Jaunpur is a wonderful example of colorful heritage

Sankalp Savera by Sankalp Savera
December 12, 2022
in Jaunpur, Life Style
0
जौनपुर है रंग-बिरंगी विरासत का शानदार नमूना
1.5k
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संकल्प सवेरा अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए है गोमती नदी के तट पर बसा उत्तर प्रदेश का जौनपुर शहर। यदि आप इतिहास के लगाव रखते हैं और देश की गंगा-जमुनी तहजीब के कायल हैं तो यहां की आबोहवा खूब लुभाएगी। चौदहवीं सदी के दौरान शर्की शासनकाल में तो जौनपुर शहर सल्तनत का स्वर्णकाल रहा। इस दौरान यहां शानदार निर्माण कार्य हुए। जिन-जिन शासकों को आप इतिहास की किताब में पढ़े होंगे, उनमें से कई प्रमुख शासकों का ताल्लुक इस शहर से रहा है। शेरशाह सूरी की शिक्षा-दीक्षा तो यहीं के तालीमी इदारे में हुई थी। मुगल बादशाह अकबर महान ने स्वयं यहां आकर शाही पुल के निर्माण का आदेश दिया तो सिखों के नौवें धर्मगुरु गुरु तेग बहादुर सिंह की यह तपोस्थली भी रहा है यह शहर। यहां आने के बाद आप खुद पाएंगे यह विरासतों का शहर है। एक ऐतिहासिक शहर है, जहां के कण-कण में देश की संस्कृति की खुशबू घुली है।

दिल्ली व कोलकाता के बीचोंबीच स्थित है यह शहर। कहते हैं इस भूभाग पर साक्षात मां सरस्वती की कृपा बरसती है। यहां कला के पुजारी, साधक रहे और अपनी कलात्मक दृष्टि से इस शहर को सजाया-संवारा। अमन की धरती है यह, जिसे वैदिक कालीन, बौद्ध, सल्?तनत, मुगल काल से लेकर शर्की काल में भी शिक्षा के प्रमुख मरकज के रूप में दुनिया में पहचान मिली है। शर्की शासन 14वीं सदी में इब्राहिम शाह शर्की, महमूद शाह शर्की व हुसैन शाह शर्की के शासनकाल में उत्तर प्रदेश, बिहार, नेपाल की तराई के भूभाग, असम के तिरहुत, उड़ीसा, ग्वालियर तक का भूभाग जौनपुर साम्राज्य के अधीन रहा है।

आज भी मौजूद है यमदग्निपुरम

Demand To Change Name Of Jaunpur Bjp Mla Wrote Letter To Cm Yogi Said  Rename Jaunpur On Rishi Jamadagni Father Of Lord Parashuram - जौनपुर का नाम  बदलने की मांग: विधायक ने

महर्षि परशुराम के पिता यमदग्नि ऋषि की तपस्थली यहां जौनपुर जिला मुख्यालय से महज पांच किलोमीटर पूरब में स्थित है। किंवदंतियों के अनुसार उनसे मिलने यहां स्वयं भगवान राम आए थे। पितृ भक्त परशुराम ने पिता की आज्ञा पाकर मां रेणुका का सिर यहीं धड़ से अलग कर दिया था। हालांकि ऋषि यमदग्नि ने अपने तपबल से पुन: रेणुका को जीवित कर दिया था। महर्षि यमदग्नि के ही नाम पर प्रारंभ में इस जनपद का नाम यमदग्निपुरम् पड़ा, जो कालांतर में जौनपुर के नाम से जाना गया। ऋषि यमदग्नि का आश्रम व रेणुका देवी का मंदिर यहां आज भी मौजूद है

रही है देश की सांस्कृतिक राजधानी

शर्की शासनकाल में यहां की शिक्षा-कला व संस्कृति इतनी समृद्ध रही कि यह भारत की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में अपनी पहचान बना सकी। इब्राहिम शाह शर्की कला के साधक रहे। जौनपुर की ऐतिहासिक धरोहरें इसके समृद्धशाली अतीत की आज भी मूक गवाह के रूप में मौजूद हैं। यही वजह है कि इतिहास के छात्रों व शोधार्थियों को यह शहर खूब आकर्षित करता है। कभी जौनपुर के इत्र की खुशबू पूरे देश में फैलती रही, लेकिन अब उपेक्षित होने के कारण जिले के इत्र उद्योग का धीरे-धीरे अवसान होता गया।

अफसरों का गांव माधोपट्टी

जौनपुर जिले के सिरकोनी क्षेत्र के माधोपट्टी गांव को अफसरों का गांव कहा जाता है। यहां से आइएएस, आइपीएस, पीसीएस मिलाकर 47 से अधिक अधिकारी निकले हैं। सबसे पहले 1914 में यहां के मुजतबा हुसैन आइसीएस चुने गए। 1952 में इंदु प्रकाश सिंह आइएफएस बने। वे फ्रांस सहित कई देशों में भारत के राजदूत रहे। 1955 में आइएएस की परीक्षा में 13वीं रैंक प्राप्त करने वाले विनय सिंह के तीन और भाई क्षत्रपाल सिंह, अजय कुमार सिंह व शशिकांत सिंह भी आइएएस चुने गए। इसी गांव के जनमेजय सिंह विश्र्व बैंक मनीला, डॉ. नीरू सिंह, लालेंद्र प्रताप सिंह वैज्ञानिक के रूप में भाभा इंस्टीट्यूट तो ज्ञानू मिश्रा इसरो में अपनी सेवाएं दे रहे हैं

शाही पुल

शाही पुल के बीच में स्थित गज-शावक प्रतिमा को पुरातत्व विभाग ने संरक्षित धरोहर घोषित किया है। शेर को दबोचे हाथी की यह प्रतिमा समृद्धशाली बौद्ध काल की याद दिलाती है। बॉक्स में उत्कृष्ट स्थापत्य कला का नमूना शाही पुल मुगल बादशाह अकबर ने जौनपुर प्रवास के दौरान शहर में गोमती नदी पर क्का पुल बनवाने का फैसला किया था। यह पुल उत्कृष्ट स्थापत्य कला का नायाब नमूना व इस जिले के लैण्ड मार्क के रूप में जाना जाता है। इस जिले के लैंड मार्क के रूप में ख्याति अर्जित करने वाला ऐतिहासिक शाही पुल सन् 1580 के आस-पास बना था। अकबर ने अपने सिपहसालार मोइन खान को इस पुल के निर्माण की जिम्?मेदारी दी थी। सड़क के समानांतर इस प्रकार के पुल की मिसाल देश में शायद ही कहीं और हो। यहां दूर से आ रही सड़क कब पुल की सड़क में तब्दील हो जाती है पता ही नहीं चलता है। आमतौर पर किसी भी पुल पर चढऩे और उतरने का क्त्रम होता है लेकिन यहां ऐसा नहीं मिलेगा।

गुरु तेग बहादुर की तपस्थली

jagran

सिखों के नौवें धर्मगुरु गुरु तेगबहादुर सिंह की तपस्थली होने का भी इस जनपद को गौरव प्राप्त है। मुगल शासक औरंगजेब के शासनकाल में तत्कालीन सामाजिक व धार्मिक दृष्टिकोण से मौजूद परिस्थितियों में गुरु तेगबहादुर देशाटन पर निकले। सन् 1670 में यहां आकर तीन माह तक विश्राम व चाचकपुर में सई नदी तट पर तप किया था। यहां से जाते समय अपना लोहे का तीर व गुरुग्रंथ साहिब की हस्त लिखित प्रति यादगार के रूप में यहीं छोड़ गए थे। गुरु तेग बहादुर रासमंडल मोहल्ले में जिस माली के घर रुके थे उस माली ने न केवल सिख धर्म स्वीकार कर लिया बल्कि अपनी जमीन गुरुद्वारे के लिए दान में भी दे दी थी। बाद में वहां गुरुद्वारे का निर्माण कराया गया, जहां आज भी सिख धर्मावलंबी अपने धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।

राग जौनपुरी

‘परिये पायन वाकी सजनी जो ना माने गुणीजन किसी की’ यह बोल उस राग जौनपुरी की है, जिसका नाम संगीत की दुनिया में बड़े ही अदब से लिया जाता है। जिले के ख्यात संगीतकार पण्डित राम प्रताप मिश्र बताते हैं कि इस राग का इजाद हुसैन शाह शर्की ने स्वयं किया था। यहां आज भी बड़ी तादाद में साधक इसकी साधना में तल्लीन हैं। ख्याल गायकी की उतपत्ति भी यहीं हुई थी। इसे बड़ा ख्याल भी कहा जाता है

शाही पुल के बीच में स्थित गज-शावक प्रतिमा को पुरातत्व विभाग ने संरक्षित धरोहर घोषित किया है। शेर को दबोचे हाथी की यह प्रतिमा समृद्धशाली बौद्ध काल की याद दिलाती है। बॉक्स में उत्कृष्ट स्थापत्य कला का नमूना शाही पुल मुगल बादशाह अकबर ने जौनपुर प्रवास के दौरान शहर में गोमती नदी पर क्का पुल बनवाने का फैसला किया था। यह पुल उत्कृष्ट स्थापत्य कला का नायाब नमूना व इस जिले के लैण्ड मार्क के रूप में जाना जाता है। इस जिले के लैंड मार्क के रूप में ख्याति अर्जित करने वाला ऐतिहासिक शाही पुल सन् 1580 के आस-पास बना था। अकबर ने अपने सिपहसालार मोइन खान को इस पुल के निर्माण की जिम्?मेदारी दी थी। सड़क के समानांतर इस प्रकार के पुल की मिसाल देश में शायद ही कहीं और हो। यहां दूर से आ रही सड़क कब पुल की सड़क में तब्दील हो जाती है पता ही नहीं चलता है। आमतौर पर किसी भी पुल पर चढऩे और उतरने का क्त्रम होता है लेकिन यहां ऐसा नहीं मिलेगा।

गुरु तेग बहादुर की तपस्थली

सिखों के नौवें धर्मगुरु गुरु तेगबहादुर सिंह की तपस्थली होने का भी इस जनपद को गौरव प्राप्त है। मुगल शासक औरंगजेब के शासनकाल में तत्कालीन सामाजिक व धार्मिक दृष्टिकोण से मौजूद परिस्थितियों में गुरु तेगबहादुर देशाटन पर निकले। सन् 1670 में यहां आकर तीन माह तक विश्राम व चाचकपुर में सई नदी तट पर तप किया था। यहां से जाते समय अपना लोहे का तीर व गुरुग्रंथ साहिब की हस्त लिखित प्रति यादगार के रूप में यहीं छोड़ गए थे। गुरु तेग बहादुर रासमंडल मोहल्ले में जिस माली के घर रुके थे उस माली ने न केवल सिख धर्म स्वीकार कर लिया बल्कि अपनी जमीन गुरुद्वारे के लिए दान में भी दे दी थी। बाद में वहां गुरुद्वारे का निर्माण कराया गया, जहां आज भी सिख धर्मावलंबी अपने धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।

राग जौनपुरी

‘परिये पायन वाकी सजनी जो ना माने गुणीजन किसी की’ यह बोल उस राग जौनपुरी की है, जिसका नाम संगीत की दुनिया में बड़े ही अदब से लिया जाता है। जिले के ख्यात संगीतकार पण्डित राम प्रताप मिश्र बताते हैं कि इस राग का इजाद हुसैन शाह शर्की ने स्वयं किया था। यहां आज भी बड़ी तादाद में साधक इसकी साधना में तल्लीन हैं। ख्याल गायकी की उतपत्ति भी यहीं हुई थी। इसे बड़ा ख्याल भी कहा जाता है

शाही पुल के बीच में स्थित गज-शावक प्रतिमा को पुरातत्व विभाग ने संरक्षित धरोहर घोषित किया है। शेर को दबोचे हाथी की यह प्रतिमा समृद्धशाली बौद्ध काल की याद दिलाती है। बॉक्स में उत्कृष्ट स्थापत्य कला का नमूना शाही पुल मुगल बादशाह अकबर ने जौनपुर प्रवास के दौरान शहर में गोमती नदी पर क्का पुल बनवाने का फैसला किया था। यह पुल उत्कृष्ट स्थापत्य कला का नायाब नमूना व इस जिले के लैण्ड मार्क के रूप में जाना जाता है। इस जिले के लैंड मार्क के रूप में ख्याति अर्जित करने वाला ऐतिहासिक शाही पुल सन् 1580 के आस-पास बना था। अकबर ने अपने सिपहसालार मोइन खान को इस पुल के निर्माण की जिम्?मेदारी दी थी। सड़क के समानांतर इस प्रकार के पुल की मिसाल देश में शायद ही कहीं और हो। यहां दूर से आ रही सड़क कब पुल की सड़क में तब्दील हो जाती है पता ही नहीं चलता है। आमतौर पर किसी भी पुल पर चढऩे और उतरने का क्त्रम होता है लेकिन यहां ऐसा नहीं मिलेगा।

गुरु तेग बहादुर की तपस्थली

सिखों के नौवें धर्मगुरु गुरु तेगबहादुर सिंह की तपस्थली होने का भी इस जनपद को गौरव प्राप्त है। मुगल शासक औरंगजेब के शासनकाल में तत्कालीन सामाजिक व धार्मिक दृष्टिकोण से मौजूद परिस्थितियों में गुरु तेगबहादुर देशाटन पर निकले। सन् 1670 में यहां आकर तीन माह तक विश्राम व चाचकपुर में सई नदी तट पर तप किया था। यहां से जाते समय अपना लोहे का तीर व गुरुग्रंथ साहिब की हस्त लिखित प्रति यादगार के रूप में यहीं छोड़ गए थे। गुरु तेग बहादुर रासमंडल मोहल्ले में जिस माली के घर रुके थे उस माली ने न केवल सिख धर्म स्वीकार कर लिया बल्कि अपनी जमीन गुरुद्वारे के लिए दान में भी दे दी थी। बाद में वहां गुरुद्वारे का निर्माण कराया गया, जहां आज भी सिख धर्मावलंबी अपने धार्मिक अनुष्ठान करते हैं।

राग जौनपुरी

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