बढ़तीआत्महत्याएँ गम्भीर चुनौती:प्रो. आर. एन. सिंह
संकल्प सवेरा, जौनपुर। मानव जीवन के समक्ष अनेक प्रकार के संकट एवम चौनौतियां हैं परन्तु इनमे आत्म हत्या की बढ़ती घटनाएं विशेष चिंता का विषय। क्योंकि आज लाखों लोग स्वयं ही अपनी जीवन लीला समाप्त करने में लगे हैं। उपलब्ध आकणों के अनुसार भारत में लगभग एक लाख सत्तर हजार लोग आज स्वयं अपने जीवन का अंत करने में लगे हैं।
प्रतिदिन ४५० से अधिक लोग मृत्यु को गले लगा रहे हैं। यह एक भयावह स्थिति है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार साल में दुनिया में आठ लाख से अधिक लोग स्वयं का जीवन समाप्त कर रहे हैं, ऐसा लगता है जैसे मुश्किलों से मुक्ति का एकमेव मार्ग उनकी सोच में आत्म हत्या ही है। ऐसी दुखद घनटनाये बढ़ती जा रही है। इससे पारिवारिक स्थिति छिन्न भिन्न हो जाती हैं और सामाजिक समस्याएं भी गंभीर रूप में बढ़ रही है। यह गंभीर चुनती है हम सभी के लिए।
भारत की बात करें तो आंकड़ों के अनुसार पारिवारिक समस्याएं आत्म हत्या की सबसे प्रमुख कारण हैं। इसके पश्चात बीमारी, ड्रग्स, वैवाहिक समस्याएं, प्यार संबंधी कारण, व्यवसाय में घाटा, परीक्षा में असफलता, किसी करीबी की मृत्यु एवम गरीबी आदि आत्म हत्या के लिए उकसाने के मुख्य कारण हैं। लगभग ग्यारह प्रतिशत मामलों में खुदकुशी के कारण नहीं पता चल पाते हैं। पिछले वर्ष महाराष्ट्र में खुदकुशी की घटनाएं सर्वाधिक देखने को मिली हैं।
वैसे भारत मे सिक्किम मे ऐसी घटनाएं सर्वाधिक पाई जा रही हैं। महाराष्ट्र भी इससे जूझ रहा है।अपना उत्तर प्रदेश फिर भी ठीक है, यह २६वे रैंक पर है। पूर्वी उत्तर प्रदेश में आत्म हत्या का सबसे बड़ा कारण पारिवारिक कलह है। आयु की दृष्टि से १८से ३० वर्ष एवम ३०से ४५ वर्ष के लोगों में यह प्रवृत्ति अधिक पाई जा रही है। खुदकुशी में इनकी भूमिका लगभग ६८ प्रतिशत है।
महिलाओं की अपेक्षा पुरुष अधिक खुदकुशी करते पाए जा रहे हैं। छात्रों में भी यह गंभीर समस्या है। यह भी देखा जाता है कि अधिकतर मामलों में ऐसे लोग फांसी लगाकर मृत्यु को गले लगाते हैं।
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि कुछ लोगों में यह प्रवृत्ति अधिक होती है तो अनेक लोग इसका सामना भी करना चाहते हैं। जीवन में घटित नकारात्मक घटनाएं भी इसमें काफ़ी योगदान करती हैं। अतः यदि व्यक्ति कठिनाइयों का सामना कर ले तो आत्म हत्या की भावना को सफलता के साथ नियंत्रित कर सकता है।
इसके लिए उन लोगों को चिन्हित करने की जरूरत है जो चिंता, तनाव या अवसाद से पीड़ित हैं।
इस हेतु परिवार एवम मित्रों से उपयोगी सूचनाएं प्राप्त हो सकती हैं। साथ ही ऐसी समस्याओं से जूझ रहे लोगों को प्रेरित करना होगा ताकि वे अपनी बातें खुलकर साझा कर सकें। उन्हें यह समझाना होगा कि कोई भी समस्या मनुष्य की हिम्मत से बड़ी नहीं है, हर समस्या का हल मिल सकता है, बस धैर्य एवं विवेक से काम लें। उनमें व्याप्त नकारात्मकता को समाप्त कर जीवन को सही पटरी पर लाने का प्रयास करना होगा।
प्रो. आर. एन. सिंह, वरिष्ठ मनोवैज्ञानिक
मनोविज्ञान विभाग (से. नि.), बी एच यू, वाराणसी












