आपसे मैं कुछ कहूं या आपसे मैं कुछ सुनू आज इसकी कोई आवश्यकता नहीं है क्योंकि हम इसी मिट्टी में पैदा हुए
इसी में लौटे पोटे
इसी में खेले कूदे
आपके स्नेह और आशीर्वाद की छत्रछाया में यहीं पर बड़े हुए
आपके इशारों को हमेशा मैंने आदेश माना
आपके दुख दर्द हमारे अपने दुख दर्द रहे
और आज वो घड़ी आ गई हैं जब इस मिट्टी के तासीर को चुनौती देने वाले यहां आ गए
उन्हें इस मिट्टी के बल का आभास नहीं है
उन्हें यह पता नहीं कि यह मल्हनी की मिट्टी है यह अपने पुत्रों को सम्मान और असम्मान दंड और पुरस्कार स्वयं देती है
किसी अन्य की हैसियत नहीं कि इसके पुत्रों की छाया भी छू सके
इसी मिट्टी के तासीर के सम्मान का सवाल है साथियों एक बार आपके आशीर्वाद की आवश्यकता
आपके पुत्र को फिर आ पड़ी है हमें विश्वास है इस आशीर्वाद पर मेरा एकाधिकार है
मल्हनी की मिट्टी का क़र्ज़दार ..आपका धनंजय सिह ..












