उग्र रूप लेता जा रहा है किसान आंदोलन: शशि मोहन सिंह क्षेम
आंदोलन से प्रभावित न हो आम जनता का अधिकार
पूर्व पीएम डॉक्टर मनमोहन सिंह नकार चुके हैं स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट

संकल्प सवेरा, जौनपुर। देश की राजधानी दिल्ली की सीमा पर युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है। खरौनी शंभू सीमा पर पुलिस और किसानों के बीच टकराव का वातावरण है। कहीं-कहीं हिंसक झड़प भी हुई है कुछ किसान घायल हो गए हैं और किसान आंदोलन उग्र होता जा रहा है। सन 2021 में भी किसान आंदोलन हुआ था। आंदोलन बाद में हिंसक हो गया और 26 जनवरी 2021 को किसान पुलिस द्वारा लगाए गए तमाम अवरोधों को रौंदते हुए राजधानी में पहुंचे जहां पुलिस और किसानों में मारपीट हुई। उस समय पुलिस ने संयम का परिचय दिया। ट्रैक्टरों को कर्तव्य पालन कर रहे पुलिस वालों को राउंड कर मार डालने की कोशिश की गई थी।
उन दिनों कई महीनो तक दिल्ली की ओर जाने वाले रास्तों पर किसानों ने जाम लगा दिया था प्रधानमंत्री द्वारा लागू किए जाने वाले कानून के प्रति किसान नेताओं ने किसानों को भ्रमित कर दिया था। अंततः प्रधानमंत्री ने उक्त कृषि कानून को वापस ले लिया किसान नेता किसानों को समझते रहे कि इस कानून से किसानों का उनकी जमीन से अधिकार छीन लिया जाएगा जबकि उसे कानून में ऐसा कुछ भी नहीं था। आज कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी आंदोलनकारी किसानों को आश्वासन दे रहे हैं कि केंद्र में उनकी सरकार बनी तो एसपी लागू कर देंगे।
स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू कर देंगे। किसानों को यह भी सोचना चाहिए कि स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट सन 2006 में आई थी उन दिनों केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और प्रधानमंत्री थे प्रसिद्ध अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह। मनमोहन सिंह ने इस रिपोर्ट का अध्ययन किया परंतु उसके लागू होने से देश की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना देखते हुए उन्होंने इसे नकार दिया। हमारे किसान देश के अन्नदाता हैं किसानों की समस्याओं को सुलझाने की कोशिश की जानी चाहिए। किसानों को शांतिपूर्ण आंदोलन करने का पूरा अधिकार है। स्वतंत्रता के बारे में एक विचारक का कथन है कि हम अपनी छड़ी वही तक घुमा सकते हैं जहां तक वह किसी की नाक से नहीं टकराए यानी किसान आंदोलन करने के लिए तो स्वतंत्र हैं परंतु सड़क अवरुद्ध करके उन्हें आम नागरिकों की स्वतंत्रता पर चोट पहुंचाने का कोई अधिकार नहीं है।
पुलिस प्रशासन भी पिछले आंदोलन के दौरान हुई हिंसक घटनाओं से सबक लेते हुए दिल्ली की सीमाओं पर कटीले तार व नुकीले तारो से घेराबंदी कर चुकी है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय एवं उच्च न्यायालय भी स्थिति पर नजर रखे हुए हैं आंदोलनकारी भी आक्रामक रूप अपना रखे हैं। ट्रैक्टर एवं जेसीबी के जरिए में पुलिस की घेराबंदी को तोड़ने की कोशिश करेंगे तो कानून व्यवस्था बिगड़ना तय है। किसानों से बातचीत करने के लिए केंद्रीय कृषि मंत्री अर्जुन मुंडा समेत तीन मंत्रियों को दायित्व सौंपा गया है। वैसे सरकार किसानों की 9 मांगें मान चुकी है। किसानों के ऋण माफ किये जाये।
एमएसपी कानून लागू किया जाये और सभी फसलों पर एमएसपी लागू हो इन मुद्दोंपर सहमति नहीं बन पा रही है। ये तीनों ऐसे मुद्दे हें जिन पर व्यापक विचार विमर्श की आवश्यकता है तथा इनके दूरगामी परिणामों को भी देखना पड़ेगा। विपक्षी दल तो चाहेंगे ही की किसानों और सरकार के बीच टकराव हो हिंसक घटनाएं हो ताकि सरकार पर किसान विरोधी होने का आरोप लगाकर चुनाव में लाभ पाया जा सके। परंतु किसानों को भी इस सच्चाई को जानना होगा।
सरकार यदि इस प्रकरण में कोई बीच का रास्ता निकाल पाती है तो इसे एक बड़ी सफलता कही जाएगी। किसानों को भी है हठधर्मिता का परित्याग करके समस्या का समाधान निकालने में सहयोगपूर्ण रवाया अपने की आवश्यकता है।












