समसामायिक रचना
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छा रही जग में बीमारी ।
व्यथित भू , रोते संसारी ।।
दूर जन – जन से रहना है ।
यही हम सब का कहना है।।
मौत दरवाजे पर आई ।
घरों में रहना सब भाई।।
नियम संयम से घर रह लो ।
जरूरत पर घर से निकलो ।।
अभी छोड़ो सारी कक्षा।
करो जीवन की तुम रक्षा।।
बचे तो सब कर पाओगे।
खो गया वो पा जाओगे ।।
दूरियां सदा बनाना है ।
कि बचना और बचाना है।।
धैर्य थोड़ा सा बस रख लो,
समय है हरि सुमिरन करलो।
– तृषा द्विवेदी “मेघ”
उन्नाव,उत्तर प्रदेश












