संकल्प सवेरा
अपाहिज हो गया चिंतन, लगा पहरा सुझावों पर,
सभी उलझे प्रभावों में, कहा किसने अभावों पर।
हुई जयकार राजा की, सिपाही गौण दिखता है,
जिसे सबने छला वो शख्स मुझको मौन दिखता है।
कथाएं राम की हैं ज्ञात पर चलना नहीं भाता,
भरत भाते सभी को हैं मगर झुकना नहीं आता।
लगा डुबकी यहाँ सब पाप धोने की फिकर में हैं,
करे अब कौन मंथन मन के अपने मैले भावों पर,
अपाहिज हो गया चिंतन, लगा पहरा सुझावों पर।
सभी उलझे प्रभावों में, कहा किसने अभावों पर।
चढ़ी है पाप पर रंगत, अभी है वक्त ठहरा सा,
अभी लगता है मुझको न्याय भी मासूम बहरा सा।
नदी की तेज धारा पर सभी हैं चाहते बहना,
किनारे की व्यथा पर अब किसी को कुछ नहीं कहना।
अभी डीजे की धुन पर नाचती दुनिया से मत पूछो,
करेगा शोध कोई क्यूँ कहो बदले स्वभावों पर,
अपाहिज हो गया चिंतन, लगा पहरा सुझावों पर,
सभी उलझे प्रभावों में, कहा किसने अभावों पर।
राजेश जैन ‘राही’
छत्तीसगढ़












