।। मल्हनी का मल्लाह ।। पहचान ही गये होंगे आप?
मल्लाह ( नाविक ) ! यह एक शब्द नहीं, जाति नहीं यह इंसानियत का सबक है और यहां यह शब्द जाति-समुदाय के लिए नहीं बल्कि नदी के भयावह भंवर रूपी जिंदगी के भंवर में रास्ता दिखाने या उलझी सी जिंदगी को बेहतर भविष्य के तरफ ले जाने वाले एक जाति की उदारता व किसी शख्स की शख्सियत पर लिखा गया है।
सच यह भी है कि जौनपुर के नाविक समुदाय का अधिकांशतः हिस्सा नीचे दिख रही तस्वीर के शख्स में खुद को देखता है, वो देखता है कि इस शख्स ने कितने लोगों को उनके दुःखों से बाहर निकाला , कितने लोगों की निस्वार्थ मदद की जैसे एक नाविक नदी के भंवरजाल में फंसे लोगों को निःस्वार्थ भाव के साथ खुद को खतरे में डालकर मदद करता है, बिना जाति-धर्म-मजहब पूछे/जाने वो गहरी नदी में छलांग लगाता है और डूबतों को मुसीबत से निकाल कर किनारे लाता है।
महसूस करिएगा और सोचिएगा क्या क्या इतना आसान है ” मल्लाह ” बन जाना ?
क्या गहरी नदी में कूदकर अपनी जान जोखिम में डालना है आसान ?
क्यों करता है मल्लाह ऐसा ?
क्यों वो लालची नहीं है ?
क्यों स्वार्थी नहीं बन रहा वो ?
क्यों उसे जोखिम से डर नहीं लगता ?
क्यों वो जाति देखकर मदद नहीं करता ? क्यों वो उस जान बचाने के बदले लाखों करोड़ों मिल जाने की चाह नहीं करता ? क्यों ???
जानते हैं क्यों ?
क्यों कि उसने लालच को नहीं इंसानियत को सीखा समझा है , झोपड़ियों में रहकर भी उसने महलों में रहने वालों की निस्वार्थ मदद की है , उसे लगाव है लोगों के अच्छे जीवन से , वो देखना चाहता है मौत के मुंह से बचाकर लाए लोगों को वापस से सांस लेते हुए, उसे इंसान मुसीबत में अच्छा नहीं लगता , वो मल्लाह है ” नदी मां का बेटा “। वही नदी मां जो निःस्वार्थ रूप से लोगों को जिंदगी में हरियाली भरती हैं….लाख गंदगी करले इंसान मगर वो आज भी जीवनदायिनी के रूप में हमें पालती सींचती हैं तो उनका बेटा ” मल्लाह ” भी वैसे ही हर दोष व लालच को नजरंदाज करते हुए बस इंसानियत के लिए अडिग खड़ा रहता है।
नीचे तस्वीर

नाव को खेते इस ” मल्हनी के मल्लाह ” को आप पहचान ही गए होंगे बिना जाति धर्म मज़हब को देखे निःस्वार्थ भाव से दशकों से लोगों की मदद किए जा रहे हैं। इनकी बढ़ती उम्र को देखकर हम युवा घबराते हैं कि काश यह शख्स विधानसभा/सदन का हिस्सा होते जहां देश/प्रदेश के भविष्य को इन्हें देखकर इनसे निःस्वार्थता और नैतिकता सीखने को मिलती
एक बात की हमें खुशी है कि हम मल्हनी के इन मल्लाह की नैय्या के कहीं कोने पर बैइठे पतवार खींचते इनको टुकुर-टुकुर देखते रहते हैं , लोगों के दुःखों को अपना समझने वाले , समाज उत्थान, प्रकृति से प्रेम , बड़ों को सम्मान व छोटों को प्यार/सीख देते देख हर बखत इनसे कुछ नैतिकता सीख पा रहे हैं…
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असामाजिक हो रहे समाज को ऐसे ही मल्लाहों की जरूरत है आप जाति-भेदभाव में बंट कर आने वाले भविष्य को स्वार्थी व अनैतिक ना बनाईए उन्हें अपने इर्द-गिर्द रहने वाले मल्लाह की जिंदगी को दिखाईए जो थोड़े में गुजर बसर करते हुए निःस्वार्थ भाव से डूबते का सहारा बनते हैं।
।।मेरी यह पोस्ट देश के सभी मल्लाह भाईयों को समर्पित है।।
~ राना 😊
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