*ये लामबंद लोग……!*
ये लामबंद लोग……!
कथित रूप से….
समाज के अलमबरदार,
राजनीति के कर्णधार,
समाज के स्वघोषित राजदार,
व्यापार के मुँहबोले कलाकार…
सिद्धांतों को…जानबूझकर…!
करते रहते हैं दरकिनार…
विचारों की लामबंदी के बजाय
करते हैं..शक्तिपुंजों की गोलबंदी..
दिखाने को….निर्धनों के लिए…!
मचाते हैं हाहाकार…पर…
उन्हीं के ऊपर भरते हैं हुंकार..
इनको तो रहती है..पूरे की दरकार
ये लामबंद तो…होते हैं…!
मानव मूल्यों के घोषित खरीददार
चाहे कोई भी हो…या फिर…
कैसी भी हो सरकार…!
दूर कहाँ होते हैं….?
कभी इनके अहंकार…
उगते सूरज को ही ये,
सदा करते हैं नमस्कार…
या फिर…केवल उजाले को..
मन से करते हैं स्वीकार…
समझौता भी कर लेते हैं…
सिद्धांतों से बारम्बार…!
फिर आश्चर्य…क्या और कैसा..?
जो…अपनों में ना समझे जाएं…
ये लोग..अकलमंद और समझदार
पोशाक..जबरदस्ती की जलवेदार
नजर आते हैं…हर जगह….!
दूसरों को…करते खबरदार…
भले…खुद तलवे चाटते..अक्सर..
दिख जाते है बरखुरदार…!
ये लामबंद लोग…
भरी महफिल में खा जाते हैं…
कभी गालियाँ और जूते हजार,
पर एक ही झटके में उतार देते हैं
कलंकों का सभी गर्द-गुबार….
क्योंकि…ये तो होते हैं खुद ही में..
अघोषित अखबार….!
मित्रों…मेरा तो मानना है कि…
इन लामबंद लोगों से…!
बचने में ही भलाई है,
जग जाहिर इनकी बेहयाई है,
इनमें..नहीं कोई अच्छाई है..!
यही समाज की सच्चाई है…
मैं शुक्रगुज़ार हूँ अपने बुज़ुर्गों का..
जिन्होंने ये बात समझाई है
पर सोचता हूँ…!
क्यों आते हैं…?
समाज में ऐसे लोग…और…
सवाल तुमसे भी है परवरदिगार..!
क्यों बनाते हो ऐसे नमूने सरकार..
क्यों बनाते हो ऐसे नमूने सरकार..
रचनाकार…
जितेन्द्र कुमार दुबे
अपर पुलिस अधीक्षक
जनपद–कासगंज












