सिरकोनी के पांच गंभीर कुपोषित बच्चों को मिला नया जीवन, एनआरसी में हुए स्वस्थ
कामयाबी
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-सैम तथा मैम के बच्चों के चिह्नांकन, पोषण प्रबंधन व संदर्भन के लिए चल रहा संभव अभियान
-23 जून 2020 को खुलने के बाद से आज तक 324 बच्चों को एनआरसी ने कुपोषण से कराया मुक्त
संकल्प सवेरा,जौनपुर, अभिभावकों को समझाकर बाल विकास परियोजना सिरकोनी के विभिन्न आंगनबाड़ी केंद्रों ने मात्र एक माह में पांच अति गंभीर कुपोषित (सैम) बच्चों को पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में भर्ती कराया गया। हालांकि इसके लिए अभिभावकों को समझाने में काफी मशक्कत करनी पड़ी। एक ही ब्लाक से मात्र एक ही माह में पांच बच्चों को भर्ती कराया जाना एक रिकार्ड है। अभी तक अधिकतम तीन ही बच्चे एनआरसी में भर्ती कराये गये थे।
अति गंभीर कुपोषित (सैम) तथा अति कुपोषित (गंभीर अल्प वजन) के बच्चों का चिह्नांकन, उनके पोषण प्रबंधन तथा संदर्भन के लिए संभव अभियान चलाया जा रहा है। इसके तहत जुलाई में सिरकोनी ब्लाक में सात माह से तीन वर्ष की आयुवर्ग के पांच बच्चे पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में भर्ती कराए गए जिसमें से दो स्वस्थ होकर घर जा चुके हैं जबकि बाकी का भी वजन बढ़ गया है।
बाल विकास परियोजना अधिकारी (सीडीपीओ) मनोज कुमार वर्मा ने बताया कि अभियान के दौरान वजन करते समय और लम्बाई नापे जाते समय मुस्तफाबाद गांव में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ऋचा सिंह ने अनुज गौड़ के घर नेहा और नृत्या बच्चियों की उम्र भी दीजिये ? नाम की बच्ची को सैम चिह्नित किया। ऋचा ने बच्ची के पिता अनुज गौड़ तथा मां शिल्पी से नेहा और नृत्या को एनआरसी में भर्ती कराने को कहा लेकिन वह तैयार नहीं हुए। पांच दिन तक लगातार प्रयास किया तो वह तैयार हुए।
चार जुलाई को बच्चे एनआरसी में भर्ती कराये गये और 17 को उन्हें डिस्चार्ज कर दिया गया। भर्ती कराते समय नेहा 4.800 किलोग्राम तथा नृत्या आठ किलोग्राम की थी जबकि डिस्चार्ज करते समय नेहा 5.550 किलोग्राम व नृत्या 8.520 किलोग्राम की हो गई थी। नेहा का वजन 750 ग्राम जबकि नृत्या का वजन 520 ग्राम बढ़ गया है। वही नाथूपुर से आंगनबाड़ी कार्यकर्ता सावित्री ने सरोजनी उम्र ? को सैम चिह्नित किया। उसकी मां सोनी और पिता सूरज भट्ठा मजदूर हैं और दलित परिवार से हैं। वह भी सावित्री को एनआरसी में भर्ती कराने को तैयार नहीं थे। सावित्री ने उन्हें बच्चे के स्वास्थ्य की उपयोगिता बताते हुए कहा कि उनके जीवन से बढ़कर कुछ नहीं है। एनआरसी में भर्ती कराने पर वह स्वस्थ हो जायेगी। वहां रहने और खाने की व्यवस्था मुफ्त रहेगी। भर्ती रहने के दौरान हर दिन के 50 रुपये मिलेंगे भी। इस पर अभिभावक तैयार हो गये और उसे 11 जुलाई को एनआरसी में भर्ती करा दिया, उस समय उसका वजन 5.130 किलोग्राम था। 18 जुलाई को बच्ची का वजन में 310 ग्राम बढोत्तरी हुयी ।
हौज उंचवा की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ऊषा ने अभिनव नामके बच्चे को सैम चिह्नित किया। उसके पिता अजय और मां आरती दलित परिवार से हैं और भट्ठा मजदूर हैं। वह भी अभिनव को एनआरसी में भर्ती कराने को तैयार नहीं थे। ऊषा ने भर्ती कराने पर बीडीओ से कहकर आवास दिलवाने का प्रयास करने का लालच दिया। तब वह तैयार हो गए। आठ जुलाई को जब अभिनव को एनआरसी में भर्ती कराया गया तब उसका वजन 5.400 किलोग्राम था जो 18 जुलाई तक बढ़कर 5.700 किलोग्राम हो गया था। उसका वजन 300 ग्राम बढ़ चुका था।
संघईपुर में अरविंद और माधुरी की 15 महीने की बेटी आयशा को नौ जुलाई को भर्ती कराया गया। तब उसका वजन 2.700 किलोग्राम था जो कि 18 जुलाई तक बढ़कर तीन किलोग्राम हो गया था। उसका वजन 300 ग्राम बढ़ चुका था । 23 जून 2020 को खुलने के बाद से लेकर आज तक एनआरसी ऐसे ही 324 बच्चों को कुपोषण से मुक्त कराकर उनके मां-बाप के जीवन में खुशहाली दे चुका है।– जो बच्चें अभी एनआरसी में है उनकी इतनी डिटेल देने की ज़रुरत नहीं है इसे संक्षिप्त करके भेजिए |
एनआरसी प्रभारी डॉ राम नगीना कहते हैं कि यहां पर कुपोषित बच्चों के इलाज के लिए चार श्रेणियां बनी हुई हैं जिन्हें हम स्टैंडर्ड डेविएशन (एसडी) कहते हैं जो कि बच्चे की उम्र और बाजुओं की गोलाई नापकर तय किया जाता है। 01 एसडी और 02 एसडी श्रेणी के बच्चों का इलाज स्थानीय प्राथमिक/सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पर ही हो जाता है। 03एसडी श्रेणी के बच्चे एनआरसी आते हैं जबकि चौथी श्रेणी में न्यूरो और कार्डियक पीड़ित बच्चे आते हैं। उनका इलाज मेडिकल कालेज में होता है।
उन्होंने बताया कि एनआरसी आने बच्चे की पहले दिन भूख की जांच की जाती है। बच्चे और उसकी मां को समय-समय पर खाना दिया जाता है। बच्चे की कुुुपोषण की स्थिति के अनुसार डाइट चार्ट तैयार कर उसे पोषक भोजन दिया जाता है। साथ आने वाली मां/अभिभावक को 50 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से अलग से खाने के लिए मिलता है। बच्चे की जांच और दवा सब मुफ्त रहती है। जो दवा अस्पताल में रहती हैै, दे दी जाती है। नहीं रहती है तो खरीद कर दी जाती है। अस्पताल आने-जाने मेंं भी मरीज का कुछ खर्च नहीं होता है। राष्ट्रीय बाल स्वास्थ्य कार्यक्रम (आरबीएसके) के लोग, आशा, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, एएनएम उसे लेेेकर आते हैं और ले जाते हैं। पीड़ित परिवार का पैसा खर्च नहीं होता है। सीडीपीओ मनोज कुमार वर्मा ने बताया कि संभव अभियान तीन महीने (जुलाई, अगस्त और सितंबर) चलेगा।












