निरंकारी संत समागम के दूसरे दिन हुई एक आकर्षक सेवा दल रैली
समर्पण से युक्त एवं अहम् भाव से मुक्त ही वास्तविक भक्ति है
-निरंकारी सतगुरु माता जी
जौनपुर ,संकल्प सवेरा “समर्पित एवं निष्काम भाव से युक्त होकर ईश्वर के प्रति अपना प्रेम प्रकट करने का माध्यम ही भक्ति है।” यह जानकारी स्थानीय मीडिया सहायक उदय नारायण जायसवाल ने वर्चुअल रूप में आयोजित महाराष्ट्र के तीन दिवसीय 55 वे वार्षिक निरंकारी संत समागम समारोह में सतगुरु माता सुदीक्षा जी महाराज के पावन संदेशों को बताते हुए कहा।
भक्ति की परिभाषा को बताते हुए सद्गुरु माता जी ने कहा की भक्ति कोई दिखावा नहीं यह तो ईश्वर के प्रति अपना स्नेह- प्रकट करने का एक माध्यम है जिसमें भक्त अपनी कला जैसे गीत, नित्य एवं कविता के माध्यम से अपने प्रभु को रिझाने के लिए सदैव ही तत्पर रहता है।
सतगुरु माता सुदीक्षा जी ने प्रतिपादन किया कि वास्तविक भक्ति किसी भौतिक उपलब्धि के लिए नहीं की जाति अपितु प्रभु परमात्मा से निस्वार्थ भाव से की जाने वाली भक्ति ही “प्रेमाभक्ति” होती है। यह एक ओत-प्रोत का मामला होता है जिसमें भक्त और भगवान एक दूसरे के पूरक होते हैं। भक्त और भगवान के बीच का संबंध अटूट होता है जिसके बिना भक्ति संभव नहीं है।
यदि हम प्रेम करते हुए भक्ति करेंगे तो जीवन में जहां विश्वास और बढ़ता जायेगा वही एक सुखद आनंद की अनुभूति प्राप्त होगी। भक्ति केवल कानरस के लिए नहीं, यह तो ईश्वर को जानने के उपरांत हृदय से की जाने वाली प्रक्रिया है। यह किसी नकल या दिखावे से नहीं की जाती। यदि हम केवल पुरातन संतों की क्रियाओं का अनुकरण करके भक्ति करेंगे तो उसे वास्तविक भक्ति नहीं कहा जा सकता हमें इन संतों के संदेशों का मूल भाव समझना होगा।
सेवादल रैली
समागम के दूसरे दिन का शुभारंभ एक आकर्षक सेवादल रैली से हुआ जिसमें महाराष्ट्र के विभिन्न क्षेत्रों से आए कुछ सेवादल भाई-बहनो ने भाग लिया। इस रैली में सेवादल स्वयंसेवकों ने जहां पी. टी. परेड, शारीरिक व्यायाम के अतिरिक्त मानवी पिरामिड, रस्सी कूद जैसे विभिन्न करतब एवं खेल प्रस्तुत किए। मिशन की विचारधारा और सतगुरु की सिखलाई पर आधारित लघुनाटिकाये भी इस रैली में प्रस्तुत की गई।
सदगुरु माताजी ने सेवादल की प्रशंसा करते हुए कहा कि सभी सदस्यों ने कोविड-19 के नियमों का पालन करके मर्यादित रूप से रैली में सुंदर प्रस्तुतीकरण किया और साथ ही माताजी ने यह संदेश दिया कि हमें मानवता की सेवा के लिए सदैव तत्पर रहना है।












