(शुचि मिश्रा)
वह अपने रंग में
सुबह की सैर के दौरान
क़दम-दर-क़दम
बढ़ते हुए देखा
धूल को जो अभी
जागी नहीं थी
सूर्य की किरणों का ताप
अभी बढ़ा नहीं था
दुनियावी कामकाज से
एक चींटी
चीनी का दाना दाबे
बढ़ रही थी
जिस पर किरणें
दुनियावी ना होते हुए
कुछ ऐसे पड़ रही थी
जैसे कोई प्रिंज्म
सुबह की सैर के दौरान
दूसरा दृश्य पकड़ से बाहर था
जहाँ झर रहा था
पीपल का एक ताम्बई पत्ता
वह अपने रंग में उतना ही
चटख था और वज़नदार।
(शुचि मिश्रा)












