संकल्प सवेरा जौनपुर।
फ़ुरसत के पल,कुछ जिंदगी के संग,
परिचय कराते हैं,कुछ विचारो के रंग।
हमने बड़े नजदीक से,गरीबी को देखा है,
उजड़े हुए चमन में,फूल को मुरझाते देखा है।
चाह तो रहे थे माली,सींचकर बड़ा कर दे,
पर सरोवर में पानी को,सूखते देखा है।
चाहत थी उनकी कुछ,बड़ा करने की,
पर नीर के न होते,अवसर को फिसलते देखा है।
जो दिल में थी हसरत ,वो धरी की धरी रह गई,
ग़रीबी के आग में मैंने,उनको को झुलसते देखा है।
इसलिए गरीबी से निकलने के,लिए करो प्रयत्न,
ग़रीबी के अभिशाप से, कईयों को निकलते देखा है।
यहां हमने “पानी,नीर” का अर्थ धन से लगाया है।और भी
प्रतीक हैं जो मैंने इस कविता में प्रयोग किया हू मेरा विश्वास
है कि आप इतने समझदार हैं कि समझ जाएंगे।
राजेन्द्र यादव












