कितने ही
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कितने ही भवन-मंदिर हैं जहाँ वर्षों से
नहीं गया कोई पर्यटक-दर्शनाभिलाषी
कितने ही रास्तों से न गुजरा कोई बरसों-बरस
कितनी ही बंजर-भूमि घास तक न उगी जहाँ
कितने ही नदी-नद सूख गए राह में
कितनी ही कश्तियाँ उलझ गई लहर-भँवर में
कितने ही कंपास से खो गयी दिशाएँ
कितने ही पेड़ों पर कभी कोई फल न लगा
कितने ही बेल-बूटे रह गए बिन फूल खिले
कितने ही लबों पर आयी नहीं मुस्कान
कितने ही इंतजा़र बस रहे आए इंतजा़र
कितने ही हृदय में बस टीस रही जस की तस
कितने ही दुखों पर हम कहते रहे- बस! बस!!













