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“”एक पल का गीत””
…………… (श्री पाल सिंह “क्षेम”)
एक पल ही जियो, फूल बनकर जियो,
शूल बनकर ठहरना नहीं जिंदगी।
अर्चना के सँजोये हुए अंजली,
तुम किसी देवता से मिलो तो सही;
जिंदगी की यहाँ अनगिनत डालियाँ,
तुम किसी पर सुमन बन खिलो तो सही।
एक पल ही जियो, तुम सुरभि बन जियो,
धूल बनकर उमड़ना नहीं जिंदगी॥
तुम भरी बीथियों के अधूरे सपन,
कुमकुमी बांसुरी पर बजाते चलो,
रात रोये हुये फूल की आँख में,
ज्योति की नवकिरण तुम सजाते चलो,
एक पल ही जियो, प्रात बनकर जियो,
रात बनकर उतरना नहीं जिंदगी॥
चेतना के किसी भी क्षितिज से उठो,
याचना के नयन – कोर परसा करो;
जिस लहर पर उड़ो, जिस डगर पर बहो,
कामना के सुधा बिन्दु बरसा करो।
एक पल ही जियो, तुम जलद बन जियो,
बज़्र बन कर धहरना नहीं जिंदगी॥
वेदना की लहर में डुबाये न जो,
धार में डूबते को किनारा बने,
शोक जब श्लोक की पूनमी छांव में,
पंथ – हारे हुए को सहारा बने।
एक पल ही जियो, गीत बनकर जियो,
अश्रु बनकर बिखरना नहीं जिंदगी॥
काल के हाथ पर भाव के भारती,
बन सदा नेह से लौ लगते चलो,
देह को ज्योति मंदिर बनाते चलो,
श्वांस की हर लहर जगमगाते चलो।
एक पल ही जियो, दीप बनकर जियो,
धूम बनकर घुमड़ना नहीं जिंदगी॥












