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खिलने को व्याकुल हर एक कली,
ख़ुश हो जीवन की ओर चली,
अब दुःख के काले मेघ छटे,
और चिंताओं की शाम ढली,
खिलने को…
मौसम लगता अलबेला है,
आई वसंत की बेला है,
आनंद उसी का दुगना है,
जिसने पतझड़ को झेला है,
अब महका हुआ हर एक गाव
और खुशबू बिखरी गली गली,
खिलने को..
हर फूल चढ़ा है, नया रंग,
भौंरे भी ख़ुश, फूलों के संग,
पुरवाई इठलाती डोले,
हर जीवन आई नई उमंग,
हरयाली लायी खुशहाली,
मनभावन ऋतु ये, लागे भली,
खिलने को..
यौवन नें भी ली अंगड़ाई,
छवि देख पिया की मुस्काई,
हर्षित होकर तन-मन नाचे,
देखो सबको मस्ती छाई,
सज-धजकर इतराकर प्रियसी,
अपने प्रियतम की ओर चली..
खिलने को..
पल्लवी रस्तोगी..देहरादून
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