आइये जानते है “पूर्व सांसद” धनंजय सिह के राजनैतिक सफर की कुछ झलकिया
राजेश मौर्य
जौनपुर। मल्हनी उपचुनाव 2020 के अखाड़े में दांव-पेंच का खेल शुरू हो गया है। यूं तो इस सियासी अखाड़े में बहुजन समाज पार्टी ने अपना प्रत्यासी उतारा रखा है लेकिन भाजपा व कांग्रेस पार्टी ने अभी तक किसी भी प्रत्यासी व प्रभारी को नही उतारा है वही इस सीट पर समाजवादी पार्टी के पूर्व विधायक स्व0 पारस नाथ यादव के पुत्र लकी यादव भी छेत्र में प्रचार करते दिख रहे है। लेकिन इस बार उपचुनाव मे सबकी नजरें कद्दावर नेता पूर्व सांसद धनंजय सिंह पर लगी है। साल 2012व 2017 के चुनाव को छोड़ लगभग एक दशक से इस सीट पर धनंजय का सिक्का चलता रहा है। धनंजय सिंह ने हर बार अपने विरोधियों को चौंकाया।
बड़ी पार्टियों के ग्लैमर से दूर धनंजय सिंह ने अपनी अधिकांश सियासी पारियों में छोटी पार्टियों पर दांव खेला और बड़ी जीत हासिल की। इस बार भी धनंजय सिंह निषाद पार्टी के सहारे मैदान में उतरने का प्रयास कर रहे है हैं। तो वही सवाल इस बात का है कि क्या भारतीय जनता पार्टी अपने सहयोगी पाटी निषाद पार्टी के लिए यह सीट छोडेगी और अगर यह सीट भाजपा निषाद पार्टी को देती है तो निश्चित रूप से यह सीट गठबंधन के खाते मे जायेगी क्योकि मल्हनी विधान सभा मे धनंजय सिह का व्यक्तिगत 45 से 50 हजार ओट है और अगर भाजपा व धनंजय सिह का ओट मिल जाय तो धनंजय सिह एक बडे अंतर से जीत हासिल कर विरोधियों को शिकस्त दे पाएंगे। क्या मल्हनी एक बार फिर 2002-2007-2009- कि तरह अपना इतिहास दोहराएगा ?
निषाद पार्टी के सहारे मैदान मे उतरने का प्रयास कर रहे
धनंजय सिंह एक बार फिर से विधानसभा मल्हनी मे स्व0 पारसनाथ यादव की मृत्यु के बाद खाली हुई सीट मे होने जा रहे उपचुनाव में मैदान मे उतर गये है । इस बार भी उन्होंने निषाद पार्टी के सहार मैदान मे उतरने का प्रयास कर रहे है जैसा कि आपको ज्ञात होगा कि निषाद पार्टी का भारती जनता पार्टी के साथ गठबंधन है लेकिन भाजपा मे इस सीट पर अपना उम्मीदवार लडाने की बात कह चुका हे तो वही निषाद पार्टी के राष्टीय अध्यक्ष संजय निषाद भी मल्हनी विधान सभा के उपचुनाव मे अपने पार्टी के लिए टिकट मांगी है क्योकि 2017 के विधान सभा चुनाव मे निषाद पार्टी दूसरे स्थान पर रही और भाजपा तीसरे स्थान पर रही।

पूर्वांचल के कुछ इलाकों तक सीमित रहने वाली निषाद पार्टी को धनंजय सिंह ने नई पहचान दी है। सियासी पंडितों की माने तो मल्हनी विधानसभा क्षेत्र में धनंजय सिंह की मजबूत पकड़ है। क्षेत्र में उन्होंने विकास के कई काम कराए हैं। यही नहीं सवर्ण वोटरों के अलावा पिछड़ी जातियों का भी उनकी अच्छी पकड़ है।
आइये जानते है धनंजय सिंह की पॉलिटिक्स में धमादेकार इंट्री कब हुई
लखनऊ यूनिवर्सिटी में छात्र राजनीति का हिस्सा रहे धनंजय सिंह इस बार भी पूरे दमखम के साथ चुनावी मैदान में ताल ठोक रहे हैं। साल 2002 में धनंजय सिंह ने पॉलिटिक्स में धमाकेदार इंट्री की। धनंजय सिंह को किसी बड़ी पार्टी का सहारा नहीं मिला था। बिहार की नई नवेली लोक जनशक्ति पार्टी के टिकट पर धनंजय सिंह ने पहली बार चुनाव लड़ा। यूपी में लोक जनशक्ति पार्टी का कोई जनाधार नहीं था। विरोधियों ने उस वक्त माना कि धनंजय सिह सिर्फ वोटकटवा साबित होंगे। लेकिन जब चुनाव नतीजे आए तो धनंजय सिह ने बड़े-बड़े सियासी दिग्गजों को चौंका दिया। धनंजय सिंह ने पहले दांव में ही कैबिनेट मंत्री और सपा के दिग्गज नेता श्रीराम यादव को चारो खाने चित कर दिया।
जनता दल (यू) का मिला साथ
साल 2007 के चुनाव में धनंजय सिंह एक बार फिर से चुनाव मैदान में उतरे। इस बार धनंजय सिंह ने जनता दल यूनाइटेड का दामन थामा। इस पार्टी का भी यूपी में कोई जनाधार नहीं था। जौनपुर में न तो पार्टी का कोई कार्यकर्ता था और न ही लोगों में पहचान। बावजूद इसके धनंजय सिंह ने अकेले दम पर चुनाव लड़ा और सपा के जिलाध्यक्ष लाल बहादुर यादव को शिकस्त दी।
इस चुनाव में बीएसपी के लालजी यादव तीसरे नंबर पर थे। सियासत के इस माहिर खिलाड़ी ने चंद सालों में ही अपना जलवा कायम कर लिया। धनंजय के बढ़ते रूतबे को देखते हुए बीएसपी ने उन्हें अपने पाले में लाने की कवायद शुरू की। साल 2009 के लोकसभा चुनाव के ठीक पहले धनंजय सिंह बीएसपी में शामिल हो गए।
इसके बाद उन्होंने पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा और धमाकेदार जीत हासिल की। धनंजय सिंह के लोकसभा में पहुंचने के बाद रिक्त हुई इस सीट पर उनके पिता राजदेव सिंह बीएसपी प्रत्याशी के तौर पर मैदान में उतरे और जीत हासिल की।
2012 के चुनाव में धनंजय सिंह की पत्नी जागृति सिंह निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर उतरी। इस चुनाव में वो जीत तो हासिल नहीं कर पाई लेकिन 50 हजार वोट पाकर अपनी ताकत का जरुर एहसास करा चुके है।












