Jaunpur.
क्या आप को पता है कि आप के अंदर एक कातिल छिपा हो सकता है, जो आप की जान लेने पर अमादा हो सकता है। वह है ख़ुदकुशी की भावना। यह एक तरह का मानसिक यमराज है। जब यह सवार होता है तो जान लेवा हो जाता है, फिर खुद को बचाना टेढ़ी खीर हो जाता है, पर ध्यान रहे बचाव मुमकिन है, बशर्ते आदमी धैर्य, एवं विवेक से काम ले। ऐसे में सगे-सम्बन्धियों की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाती ।
हमें मालूम होना चाहिए कि इस समय दुनिया में लगभग नौ लाख लोग ख़ुदकुशी कर रहे हैं। इसमें लगभग एक लाख पैतीस हज़ार (लगभा 17%) भारतीय होते हैं। वैसे तो ख़ुदकुशी कि संभावना जीवन पर्यन्त रहती है, परन्तु 15-29 वर्ष आयु के लोगो मेँ मृत्यु का यह दूसरा सबसे बड़ा कारण है। दुनिया में कुल मृत्यु में लगभग डेढ़ प्रतिशत हिस्सा ख़ुदकुशी का है। कुल आत्महत्यायों में लगभग 80 % आत्महत्याएँ निम्न- मध्यम वर्ग के लोग करते हैं । महिलाओं की अपेक्षा पुरुष मृत्यु को ज्यादा गले लगाते हैं। वैसे ख़ुदकुशी का प्रयास महिलायें अधिक करती हैं (एन.सी.आर.बी.) । ये भी जानिए कि हर चालीस सेकंड पर एक आदमी मौत को गले लगा रहा है। यह दुनिया में मृत्यु का अट्ठारहवाँ सबसे बड़ा कारण है। अब सोचिये, देश दुनिया में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति क्या है?
जहाँ तक कारणों का प्रश्न है, वे अनेक हैं। परन्तु, पारिवारिक समस्याएं, बीमारी, वैवाहिक समस्याएं, गरीबी एवं क़र्ज़, प्रेम में असफलता, बेरोजगारी, मादक पदार्थ, निराशा एवं तनाव अदि ख़ुदकुशी के प्रमुख कारण हैं ।
आत्महत्या की घटना की जानकरी होने पर सगे सम्बन्धी भौचक्के रह जाते हैं। परन्तु ऐसा नहीं है कि ऐसा अचानक होता है। कोई आदमी ख़ुदकुशी के चंगुल जब फंसता है तो कुछ लक्षण उसके व्यवहार एवं आदतों में दिखाई देते हैं, उस पर गौर करने कि जरुरत होती है । जैसे, जीवन नीरस लगना, दुनिया का निरर्थक लगना, खोये-खोये रहना, लोगों से कटे-कटे रहना, सम्बन्धियों से दूरी, आत्महत्या सम्बंन्धी खबरों में रूचि लेना, नशीले पदार्थो का सेवन, दैनिक जीवन में अचानक बदलाव, ज्यादातर अकेले में रहना, इत्यादि जैसे लक्षण आत्महत्या की मानसिकता की ओर इशारा करते हैं। सगे- सम्बन्धियों को इसे भांप कर सतर्क हो जाना चाहिए।
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि आत्महत्या के चंगुल में फंसा आदमी उससे मुक्त तो होना चाहता है, मगर संकोच में अपना दर्द साझा नहीं करना चाहता है। ऐसे में परिवार, सम्बन्धियों, मित्रों एवं शिक्षकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। उस व्यक्ति को विश्वास में लेकर उसकी भावनाओं को जाने का प्रयास करना चाहिए, उसे नकारात्मकता के भंवर से बाहर लाने का प्रयास करना जरुरी है। खुद को उसकी जगह रखकर उसका विश्वास जीतिए, उसके मन को रिश्तों से जोड़िये, और यह भी बोलिये की ख़ुदकुशी किसी समस्या का समाधान नहीं है, परिवार का क्या होगा, आप की ख्वाहिशों का क्या होगा? उसे अकेला मत छोड़िये, दुनियादारी से जोड़िये, उसका मनोबल बढ़ाइए। उसके मन में ये भाव पैदा करिये कि जीवन कुछ करने के लिए मिला है, चुनौतियों से जूझना बहादुरी है और तुम बहादुर हो, अपने अंदर छुपे कातिल को ललकारो । जीवन में पुराने दिन वापस आ जायेंगें। आखिर, रात के बाद फिर सुबह होती है न ? यकीन मानिये, तनाव के चंगुल में फंसा व्यक्ति उससे बाहर आ जायेगा।
लेखक
प्रो. आर. एन. सिंह
मनोविज्ञान विभाग, बी. एच. यू, वाराणसी